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मेरी डायरी - ईथूजा साइनाएपियम (Aethusa Cyanapium )

Saturday, 3 September 2011

क्या  एक रोगी की केस हिस्ट्री  एक कन्सलटेशन मे पूरी हो जाती है ?  बहुधा यह संभव नही हो पाता । पहली बार आया हुआ नया रोगी बहुधा उन लक्षणॊं को तरजीह  नही देता जिसको उसको लगता है कि उनकी महत्ता कम है । लेकिन २-३ कन्सलटेशन और रोगी के परिवार जनों के साथ वार्तालाप के बाद कै नये लक्षण प्रकाश मे आते हैं जिनसे आगे के केस को संभालना आसान हो जाता  है । हाँ , अलबत्ता उन रोगियों या उनके परिवार के लोगों मे जहाँ होम्योपैथिक की समझ होती है वहाँ परेशानी नही आती । यह चर्चा मै इस लिये कर रहा हूँ क्योंकि कई बार मुझे नये रोगियों के साथ इस तकलीफ़ से गुजरना पडा है । कुछ इसी तरह ६ वर्षीय सानिया के साथ हुआ । epileptic convulsions  या आक्षेपॊं  से पीडित सानिया का इलाज फ़रवरी २०१० से सितंबर २०१० के मध्य चला और इस के दौरान कई बार केस हिस्ट्री के आधार पर सही सिमिलमम को बदलना पडा और आखिरकार कुछ अप्रत्याशित से आक्षेपों मे कम इस्तेमाल होने वाली औषधि ईथूजा साइनाएपियम से वह पूरी तरह से स्वस्थ हुयी ।

aethusa

सम्पूर्ण केस को रखने  के पहले ईथूजा साइनाएपियम को स्मरण करना एक बार उचित होगा ।  यूरोप मे पायी जानी वाली एक साधारण सी घास  फ़ूल्स पार्सली ( fools parsley ) से यह औषधि तैयार की जाती है । नन्हें-२  बच्चॊ की यह सच्ची मित्र है क्योंकि यह उनकी बहुत सी समस्याओं से छुट्कारा दिलाती है विशेषकर दूध की उल्टी करने वाले शिशुऒं मे । शिशु जैसे ही दूध पीता है वह या तो वमन से भारी मात्रा मे निकल जाता है और अगर कुछ देर के लिये वह पॆट मे ठहर गया तो वमन जैसे जमे हुये दही के रुप मे होती है । प्यास न के बराबर और निद्रा का आवेश बहुत अधिक इसके प्रधान लक्षण हैं ।

aethusa intolerance of milk

इसके अलावा ईथूजा  ऐसे आक्षेपों मे भी उपयोगी रहती है निनमे अगूंठॆ भिंच जाते हैं और आँखे नीचे झुक जाती हैं । रोगी का हाव भाव एक खास पहचान लिये होता है । उसकी आखॆं धँसी होती हैं तथा नथूनॊ से मुख के कोणॊं तक खिंची दो स्पष्ट रेखाओं और ऊपरी ओंठ से घरे भाग मे मोती जैसी सफ़ेदी रहती है । इसे नासिका रेखायें  कहते हैं ।

 aethusa dullness during examination ईथूजा का प्रयोग ध्यान केंद्रित करने की शक्ति के अभाव मे भी रहता है और यही कारण है कि यह औषधि अकसर उन शिक्षार्थियों मे भी प्रयोग की जाती है जहाँ अवससन्नता , ध्यान केद्रितं करने का अभाव और एक खास तरह की गमगीनता रहती है ।

 love for animals लेकिन एक और लक्षण  भी है जिसकी नजर मेरी इस केस को लेते और repertorise करते हुये पडी । और वह है जानवरॊं से अथाह प्रेम । और यही इस रोगी कॊ ठीक करने प्रधान लक्षण साबित हुआ |

सानिया को जब उसके पिता दिखाने के लिये  पहली बार लाये तो वह अन्य बच्चॊ से अलग सी दिखी । अगस्त २००९ मे पहला आक्षेप पडा और उसके बाद यह सिलसिला लगातार ३-४ दिनों के अन्तराल पर चलता रहा । इस दौरान ऐलोपैथिक इलाज का सहारा लिया लेकिन आक्षेपों मे कमी न आयी । अन्तर अवशय बढ गया लेकिन इसके बावजूद आक्षेप  पडते रहे । ५ भाई बहनॊ मे ४ नम्बर मे यह लडकी का चेहरा और  स्वभाव कुछ अजीब सा दिखा । चेहरा तमतमाया हुआ जैसे लडने मे मूड मे हो , सन्तुष्ट किसी से भी नही , अकेले रहना पसन्द और अन्य भाई बहनों से पटरी बिल्कुल भी नही । ऐसा भी नही था कि परिवार मे उसके साथ कोई भेद भाव रखा जाता रहा हो । उसके पिता के अनुसार रोज नई –२ तरह की डिमांड , कभी नये मोजों की फ़रमाईश और कभी मुर्गी के बच्चॊ की । एक डिमाडं पूरी की जाती तो नयॊ डिमाडं खडी हो जाती । लडाई झगडा पडॊसियों के बच्चॊ से तो था ही लेकिन अपने भाई बहनों से भी पटरी नही खाती थी । घर मे किसी का समझाना तो मानो आफ़त सी खडी कर देता । और कम से कम मेरे किसी भी सवाल का जबाब उसने कभी भी ठीक से नही दिया ।

sania

रिपर्टर्जेशन के आधार पर Chamomilla ,  Staphysagria , Sepia , Carcinocin और Cina मे से कैमोमिला सबसे उपयुक्त औषधि के रुप मे ऊभरी । अत: पहला प्रिसक्र्पशन कैमोमिला २०० और pl  से किया गया । लेकिन १० दिन की समाप्ति पर न तो मानसिक लक्षणॊं मे और न ही आक्षेपों मे अपेक्षित परिणाम दिखाई दिये । आक्षेप पूर्वत: की तरह ४ दिन पर पडॆ । दूसरे सप्ताह की समाप्ति पर कैमोमिला के साथ Oenanthus crocata  Q और Artemesia vulgaris Q को जोडा गया । इस बार आक्षेप पहले की तुलना मे कम रहे लेकिन मानसिक लक्षण वैसे ही रहे |  इस १५ दिन के दौरान आक्षेप घट कर २ बार पर आ गये । यह क्रम अप्रैल मध्य तक चला , कभी आक्षेप कम और कभी अधिक ।

अप्रेल के महीने के अंत मे मुझे अचानक उसके घर पर उसकी माँ को देखने जाना पडा . जब मै उसकी माँ को देख कर कमरे से बाहर निकल रहा था तो मेरी नजर उस लडकी पर पडी . दरवाजे  के पास बैठी वह  दो बिल्ली के बच्चों को अपनी गोदी मे लेकर  सुलाने की कोशिश कर रही थी । मै एक क्षण  के लिये रुका और  एक  पल उसको  देखता रहा . कम से कम इतनी अवधि मे उसके चेहरे पर इतना भोलापन और सौम्यता कभी न देखी । वह बिल्कुल अबोध बच्चॊ की तरह शांत नजर आ रही थी । मुझे देखकर वह मुस्कराई और धीरे से मुझे सलाम किया । मै अपलक उसको देखता रहा और  वापस पल्टा और उसकी माँ से उसके इस व्यवहार के बारे मे पूछ्ने लगा । ’यही इसका स्वभाव है ,  कबूतरॊं , बिल्ली और अन्य जानवरों  के बच्चॊ को छॊडकर इसकी निभती किसी से नही  है ’, उसकी माँ बोली

मैं क्लीनिक वापस आया और सिन्थीसस रिपर्ट्री मे love for animals रुब्रिक को तलाशने लगा ।

MIND - ANIMALS - love for animals
aeth. ambr. bar-c. bufo calc. calc-p. carc. caust. lac-del. lac-f. lac-leo. limest-b. med. nat-m. nuph. phos. psor. puls. sulph. tarent.
MIND - ANIMALS - love for animals - talking to animals
aeth.

ईथूजा हर लक्षण को तो नही लेकिन  प्रमुखता से दिखने वाले rare, striking  और  characteristic लक्षणॊं को कवर कर रही थी  , वह आक्षेपों और विशेष मानसिक लक्षण love for animals को कवर कर रही थी लेकिन क्या ईथूजा वाकई मे उसकी दवा थी , थोडी सी और तलाश मे ईथूजा के मानसिक लक्षणॊं पर वृहद लेख Alexander Gothe and Julia Drinnenberg की Homeopathic Remedy Pictures में मिला । एक नजर :

    • patients requiring Aehusa are often loners who live a withdrawnlife , together with one or several animals.
    • This reclusion into solitude develops slowly, fuelled by personal dissapontments and a feeling of not being able to understand the society with its manifold ideas , opinions and trends . They feel different.
    • they find it hard to build up contacts and relationship with other people , to communicate with or show an intrest in others.
    • These patients have their own intense thoughts and feelings, but they timidily keep them to themselves because they think that no one understands them or wants to know.

    • Thus their  emotions are bottled up; they are unable to express them, and this unconscious conflict results in these people withdrawing further and further.
    • Eventually they avoid people . they become outsiders, compensate by acquiring many animals and dedicate their whole life to them.

    • In this way they construct a substitute world in which the company and affection of the animals render any need for contact with human beings superfluous.

    • Through their sensitive communication with the animals , these patients release their pent up emotions and achieve the kind of pleasure which they were not able to find with humans.
    • If they do not suceed in building this kind of community in order to relax emotionally , their emotional affections begin to emerge in the form of soliloquies or illnesses.

अप्रेल २०१० के मध्य मे चल रहे औषधियों को हटा कर ईथूजा १००० और pl दी गई और परिणाम अविस्मर्णीय रहे । मई तक आते –२ आक्षेप लगभग  बन्द हो गये और मुख्य बात कि रोगी के व्यवहार मे असाधारण परिवर्तन दिखाई दिया , अब तो न वह आक्रामक थी , न ही उसकी कोई अनावशयक  डिमाडं थी । अक्टूबर २०१० तक ईथूजा १००० को २ बार रिपीट करना पडा । सानिया आज पूर्ण्तया स्वस्थ है । अक्टुबर मे उसका इलाज बन्द कर दिया और उसके पिता को खासकर ताकीद दी कि अगर कोई व्यवहार मे कोई  परिवर्तन दिखे तो फ़िर तुरन्त मिले ।

मानसिक लक्षणॊं का आधार होम्योपैथिक प्रेसक्राइबिग  का प्रमुख घटक है ।

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आर्गेर्नान आफ़ मेडिसेन मे हैनिमैन ने लिखते  हैं :

§ 5

HAHNEMANN Useful to the physician in assisting him to cure are the particulars of the most probable exciting cause of the acute disease, as also the most significant points in the whole history of the chronic disease, to enable him to discover its fundamental cause, which is generally due to a chronic miasm. In these investigations, the ascertainable physical constitution of the patient (especially when the disease is chronic), his moral and intellectual character, his occupation, mode of living and habits, his social and domestic relations, his age, sexual function, etc., are to be taken into consideration.

सूत्र ५-रोग के मूल कारण की खोज

रोग नया हो या पुराना चिकित्सक को बीमारी के मूल कारणॊं की खोज करना नितान्त आवशयक  है । नये रोगों मे रोग उत्पन्न करने और रोग को उत्तेजना देने वाले कारणॊं पर तथा पुरानी बीमारियों मे रोग के इतिहास पर चिकित्सकों को बहुत अधीरता और सावधानी से विचार करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने पर ही रोग के मूल कारण का पता लग सकता है । वस्तुत: चिकित्सक को रोगी की शरीर रचना और प्रकृति – गठन , शक्ति , स्वभाव , आचरण , च्यवसाय , रहन सहन , आदतें , समाजिक तथा परिवारिक संबन्ध , आयु, ज्ञान्निद्र्यों के व्यवाहार पर पूरी तरह से विचार कर लेना चाहिये ।

    § 213

    We shall, therefore, never be able to cure conformably to nature – that is to say, homoeopathically – if we do not, in every case of disease, even in such as are acute, observe, along with the other symptoms, those relating to the changes in the state of the mind and disposition, and if we do not select, for the patient’s relief, from among the medicines a disease-force which, in addition to the similarity of its other symptoms to those of the disease, is also capable of producing a similar state of the disposition and mind.1

    1 Thus aconite will seldom or never effect a rapid or permanent cure in a patient of a quiet, calm, equable disposition; and just as little will nux vomica be serviceable where the disposition is mild and phlegmatic, pulsatilla where it is happy, gay and obstinate, or ignatia where it is imperturbable and disposed neither to be frightened nor vexed.

सूत्र २१३ – रोग के इलाज के लिये मानसिक दशा का ज्ञान अविवार्य

इस तरह , यह बात स्पष्ट है कि हम किसी भी रोग का प्राकृतिक ढंग से सफ़ल इलाज उस समय तक नही कर सकते जब तक कि हम प्रत्येक रोग , यहां तक नये रोगों मे भी  , अन्य लक्षणॊं कॆ अलावा रोगी के स्वभाव और मानसिक दशा मे होने वाले परिवर्तन पर पूरी नजर नही रखते । यादि हम रोगी को आराम पहुंचाने के लिये ऐसी दवा नही चुनते जो रोग के सभी लक्षण  के साथ उसकी मानसिक अवस्था या स्वभाव पैदा करनेच मे समर्थ है तो रोग को नष्ट करने मे सफ़ल नही हो सकते ।

सूत्र २१३ का नोट कहता है :

ऐसा रोगी जो धीर और शांत स्वभाव का है उसमे ऐकोनाईट और नक्स कामयाब नही हो सकती , इसी तरह एक खुशमिजाज नारी मे पल्साटिला या धैर्यवान नारी मे इग्नेशिया  का रोल नगणय ही  रहता है क्योंकि यह रोग और औषधि की स्वभाव से मेल नही खाते ।

pkt 2

Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें ।

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Complete Freund's Adjuvant (CFA) द्वारा गठिया से पीडित किये गये चूहों पर होम्योपैथिक औषधि रस टाक्स के परीक्षण ( Modulation of arthritis in rats by Toxicodendron pubescens and its homeopathic dilutions.)

Tuesday, 9 August 2011

rats

Source : pubmed & Indian Journal of Research in Homeopathy

पशुऒं पर होम्योपैथिक दवाओं के परीक्षण अधिक देखे नही जाते हैं लेकिन इधर हाल के दिनों मे इन परीक्षणॊं की संख्या बढी है , हाँलाकि यह होम्योपैथिक सिद्दातों का पूर्ण रुप से पालन नही करते इसके बावजूद इनकी महत्ता से इन्कार नही किया जा सकता है । होम्योपैथिक पद्दति मे निशिचित सिद्दांत हैं और उनके लिये लक्षणॊं का लेना और उनके ऊपर प्रेसक्राब करना एक अनिवार्य शर्त है ।

हाँलाकि हाल ही मे The Faculty of Homeopathy २०११जर्नल मे प्रकाशित एक लेख जो पबमेड पर प्रकाशित हुआ कम चर्चा का विषय रहा । पटेल इन्सटिटुयूट आफ़ फ़ारमासियुटिकल रिसर्च के सी.आर. पाटिल , आर.बी.जाधव आदि का लेख रस टाक्स की anti inflammatory property पर था ।

सर्वप्रथम Complete Freund's Adjuvant (CFA) द्वारा चूहों को गठिया से पीडित किया गया और उसके बाद सिलसिलेवार शुरु हुये  प्रयोगशाला परीक्षण । रस टाक्स के 3cH, 6cH, 30cH, 200cH पोटेन्सी को सफ़लतापूर्वक प्रयोग  कर के उनके परिणामों को होम्योपैथिक मैटैरिया मेडिका आदि मे वर्णित लेखों  के आधार को  सही पाया गया । यह रिसर्च अभी जारी है ।

Modulation of arthritis in rats by Toxicodendron pubescens and its homeopathic dilutions.

Patil CR, Rambhade AD, Jadhav RB, Patil KR, Dubey VK, Sonara BM, Toshniwal SS.

Source

R. C. Patel Institute of Pharmaceutical Education and Research, Karvand Naka, Shirpur 425 405, Dhule, Maharashtra, India.

Abstract
BACKGROUND:

Toxicodendron pubescens P. Mill (Anacardiaceae) known in homeopathy as Rhus toxicodendron (Rhus tox) is used as an anti-inflammatory medicine in homeopathic practice. In this study, Rhus tox in its crude form and homeopathic dilutions (3cH, 6cH, 30cH, 200cH) was evaluated for effects on Complete Freund's Adjuvant (CFA) induced arthritis in rats.

METHOD:

We assessed the severity of arthritis through observations including inflammatory lesions, body and organ weight and hematological parameters including C-reactive protein (CRP). Blinded radiological analysis of the affected joints and pain intensity determination was also carried out.

RESULTS:

Rhus tox protected rats from CFA-induced inflammatory lesions, body weight changes and hematological alterations. Rhus tox protected against radiological joint alterations due to arthritis. Arthritic pain scores were also favorably affected by Rhus tox. All the dilutions of Rhus tox including crude form showed anti-arthritic activity. The maximum protective effect was evident in the crude form at 10mg/kg/day, by mouth.

CONCLUSION:

This study supports claims in the homeopathic literature on the role of Rhus tox and its ultra dilutions in the treatment of arthritis and associated pain. Further study is needed to explain this anti-arthritic effect of Rhus tox.

pkt 2

Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें ।

व्यक्तित्व विकास, शारीरिक भाषा और होम्योपैथी – एक अभिनव अवधारणा ( Constitutional Prescribing ,Body Language and Homeopathy )

Friday, 17 June 2011

होम्योपैथिक प्रिसक्राबिंग मे विवधिता अकसर देखी जा सकती है । लगभग हर चिकित्सक का औषधि सेलेकशन अन्य से भिन्न ही दिखता है । एक उचित सिमिलमम को सर्च करने के लिये कई  चिकित्सक सम्पूर्ण लक्षण ( totality of symptoms ) लेने पर यकीन करते है , कई मियाज्म (miasm ) आधारित प्रिसक्र्पशन पर पर , कुछ उन अनोखे लक्षण  को  तलाशते हैं ( rare , uncommon & striking symptoms ) जो रोग के सामान्य लक्षण से अलग दिखता है ; कई डां सहगल के तरीकों का अनुकरण करते हुये सिर्फ़  मानसिक लक्षण पर  प्रिसक्राइब करते हैं और कई डां प्रफ़ुल्ल विजयकर  का अनुकरण करते हैं जिनमें  रोगी की गतिविधि, ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( thermal ), प्यास और शारीरिक या मानसिक लक्षण में  बदलाव औषधि सेलकशन के लिये पर्याप्त मापदंड रहता है ।

  इनमे से वह भी हैं जो शरीर की भाषा ( Body language )  और Constitution को आधार मानकर प्रिसक्राबिग  करते हैं । शारिरिक भाषा हमारे चारों तरफ है. यह एक दिलचस्प विषय है और एक है रोमांचकारी अनुभव भी । शारिरिक भाषा मौखिक संचार में तो एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती ही है लेकिन  एक होम्योपैथ के लिये तो रोगी की शारिरिक भाषा को समझना और भी आवशयक हो जाता है । भले ही रोजमर्रा की जिदंगी मे इसकी कोई अहमियत न हो लेकिन अगर हम नैदानिक(clinical) बिदुं से अगर हम उसका उपयोग करे तो उसके प्रयोग सार्थक सिद्ध होते है ।

pt in clinic

रोगी का परमार्श कक्ष मे प्रवेश करना , उसका उठना/बैठना , वार्तालाप करते समय उसके चेहरे के हाव भाव आदि एक उचित सिमिलिमम की आवशयकताओं को पूरा करते हैं ।  इसकी उपयोगिता सिर्फ़ किताबी ज्ञान तक ही सीमित नही है बल्कि यह अन्य क्षेत्रों भी उपयोगी है जैसे :

  • एक तरफ़ा रोगों मे जहाँ लक्षण न के बराबर दिखाई पड्ते हों ।
  • मनश्चिकित्सीय रोगियो में
  • बाल रोगों मे
  • विरोधाभासी लक्षणॊं मे
  • बहरे, गूंगे और मन्द बुद्दि रोगियों मे
  • समृद्ध और जटिल मेटेरिया मेडिका और रेपर्टिरी के अध्यन्न को सरल बनाने मे ।
  • शरीर की भाषा की मदद से रुब्रिक्स को समझने मे ।
  • और सबसे मुख्य बात कि यह बहुत बहूमूल्य  समय बचाता है ।

इसी तरह Constituitional  प्रेसक्राइबिग की भी होम्योपैथिक औषधि चुनाव  मे एक महत्वपूर्ण भूमिका है ।   होम्योपैथिक आधारित constituition का तात्पर्य एक इन्सान के मानसिक और शारिरिक व्यक्तित्व  को परिभाषित करना है । लेकिन यह भी एक सत्य है कि इसकी बुनियाद हैनिमैन ने नही रखी । गैलन (130-200 ई.पू.) और हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.)  ने मनुष्य के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया । जहाँ हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.) का मानना था कि शरीर चार humors अर्थात रक्त,कफ, पीला पित्त और काला पित्त से बना है. Humors का असंतुलन, सभी रोगों का कारण है . वही गैलन Galen (130-200 ई.) ने इस शब्द  का इस्तेमाल  शारीरिक स्वभाव के लिये किया , जो यह निर्धारित करता है  कि शरीर  रोग के प्रति किस हद तक संवेदन्शील है । हिप्पोक्रेट के  Humour शब्द का तात्पर्य शरीर मे प्रवाहित हो रहे तरल पद्दार्थ से था हाँलाकि यह तकनीकी रुप से यह प्रचलित भावनाओं से जुडा था जैसे :

  • प्रसन्नता या खुशी का रक्त से संबध - सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament)
  • कफ़ का चिंता और मननशीलता से संबध - फ़ेलेगमेटेक ( phlegmatic Temperament)
  • पीले पित्त का क्रोध से संबध - कोरिक (Choleric Temperament)
  • उदासी का काले पित्त से - मेलोन्कोलिक (Melancholic Temperament)

hippocratic temperament

4 humours in respective order: choleric, melancholic, phlegmatic, and sanguine

इन चार स्वभावों को हम एक सक्षिप्त  उदाहरंण से  आसानी से समझ सकते हैं । एक होटल मे चार मित्र  सूप पीने जाते है । लेकिन अचानक चारों की नजर सूप मे तैरते बाल की तरफ़ पड जाती है  पहला  मित्र देखते ही आग बबूला हो उठा , गुस्से से उसने सूप का प्याला वेटर के मुँह पर दे मारा ( Choleric ) , दूसरे ने मुँह बनाया  अपने कोट को झाडा और सीटी बजाता हुआ निकल गया (Sanguine) , और तीसरा रुँआसा सा हो गया और बोला कि यह सब उसी की जिदंगी मे अक्सर क्यूं होता रहता है (Melancholic ) और चौथा मित्र तो बडे दिमाग वाला निकला , सूप मे से बाल को किनारे किया ;सूप पिया और वेटर से नुकसान हुये सूप के बदले दूसरे सूप की फ़रमाईश भी कर डाली ( phlegmatic)

इन चार स्वभावों को देखने  से यह लगता है कि अमुक स्वभाव अच्छा या बुरा होता है , लेकिन  ऐसा नही है , प्रत्येक स्वभावों के धन पक्ष भी है और ॠण पक्ष भी । हाँ उचित सिमिलिमन से हम उन कमजोरियों को कम अवशय कर सकते हैं या यो कहें कि  ॠण पक्ष  को धन पक्ष मे बदल सकते हैं ।

एक नजर देखते हैं इन चार स्वभावों मे धन पक्ष और ॠण पक्ष की :

सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament):

धन पक्ष : हमेशा प्रसन्न रहने वाले, आत्मविशवास से भरपूर , आशावादी , बहिर्मुखी और जीवन को जीने वाले ।

ॠण पक्ष :आत्मसंतोष की कमी , संवेदन्शील, अल्पज्ञता, अस्थिरता, बाहरी दिखावा करने वाले और ईर्ष्या को झुकाव ।

फ़ेलेगमेटेक टेम्परामेन्ट ( phlegmatic Temperament) :

धन पक्ष :   अच्छी तरह से संतुलित,  जीवन के साथ संगत, भरोसेमंद, रचनात्मक और विचारशील, संतुष्ट

ॠण पक्ष : आलसी, अकर्मण्य . अपने  कर्तव्य की उपेक्षा ,  दुविधाग्रस्त, अपने कर्तवों  को टालने वाले , महत्वाकांक्षा विहीन ,  दूसरों को भी प्रेरित न कर पाना

कोरिक टेम्परामेन्ट (Choleric Temperament) :

धन पक्ष : मजबूल इच्छाशक्ति वाले , दुनिया को अपने तरीके से चलाने वाले , आत्मविशवास से भरपूर

ॠण पक्ष : प्रचंड गुस्सा , अपने को श्रेष्ठ समझना , विरोधों को सहन न कर पाना , सहानभूति का अभाव , जीवन मे छ्ल , कपट और पाखंड का सहारा लेना

मेलोन्कोलिक टेम्परामेन्ट (Melancholic Temperament) :

धन पक्ष : प्रतिभाशाली, बेहद रचनात्मक , संवेदनशील, सपने देखने वाले , अतंर्मुखी, विचारशील,  आत्म त्याग की भावना से भरपूर , जिम्मेदार, विश्वसनीय

ॠण पक्ष : चिंता और अवसाद ग्रस्त , अपनी प्रतिभा का कम उपयोग करने वाले , मुखरता की कमी , आसानी से किसी को माफ़ न कर पाना , बेहद संवेदनशील



मन और शरिरिक गठन की गहरी जडॆं
पाइथागोरस से जुडी हैं
उदर हिप्पोक्रेट्स से
शाखायें पेरासेलसस में
और फ़ल वास्तव मे हैनिमैन से जुडॆ हैं ।

हैनिमैन की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होने Hippocratic temperaments और humors को मैटेरिया  मेडिका मे एकीकृत कर के हमे यह दिखाया  कि हम किसका इलाज कर रहे हैं और वह किस से पीडित है ।
आर्गेनान आफ़ मेडिसन मे हैनिमैन लिखते हैं :
HAHNEMANN

Aphor .211

This is true to such an extent, that the state of patient’s Mind and Temperament (Gemuethszustand) is often of most decisive importance in the Homoeopathic selection of a remedy, since it is a sign possessing a distinct peculiarity, that should least of all escape the accurate observation of the physician.

यह बात किसी सीमा तक सही और सत्य है कि रोगी की मानसिक दशा रोग के लिये उपयुक्त औषधि चुनने मे बहुत सहायक होती है । जो चिकित्सक सावधानी के साथ इस निर्णायक मानसिक लक्षण पर दृष्टि रखतेहैं उनकी तीक्ष्ण नजर से रोगी के रोग का कोई भी लक्षण छिपा नही रह सकता |

क्लीनिकल प्रकैटिस मे Constituitional prescribing की भूमिका :

रोगी को देखते हुये मूल स्वभाव को तो हम देखते ही हैं लेकिन रोग ग्रस्त मनुष्य में जब वह स्वभाव मूल  से भिन्न दिखाई पडता है तो उसकी भूमिका और भी अधिक बढ जाती है । जैसे  एक कैल्कैरिया कार्ब का रोगी जो phlegmatic स्वभाव का है किसी कारण वश बहुत उग्र हो जाता है ( Choleric)  तो उसका यह भिन्न स्वभाव दवा का  सेलेक्शन मे भिन्न्ता ला सकता है । इसी तरह मृदु भाढी पल्साटिला नारी तनाव को झेलने मे अपने को असहज  पाती है तो उसमे होने वाले स्वभावों मे अन्तर दवा के चुनाव मे फ़र्क डाल सकते हैं ।

लुक डि फ़िशर ने Hahnemann Revisited पुस्तक  मे एक उदाहरण के जरिये सचित्र इसको समझाया है ।

एक फ़ास्फ़ोर्स व्यक्त्तित्व का इन्सान जो अपनी यात्रा अपने ही व्यक्तित्व मे न कर पाया । कारण समय-२ उसके जीवन  चक्र मे आने वाले परिवर्तन ।  चित्र पर किल्क करें और देखें ।

रोगी मे आने वाले स्वभावों मे अन्तर मानसिक लक्षणॊं की श्रेणी मे आते हैं । और दवा चुनाव मे वह अपनी वरियता सबसे ऊपर रखते हैं । नये रोगों ( acute diseases ) मे इनकी भूमिका भले ही बहुत न हो लेकिन जटिल और पुराने रोगों मे यह दवा चुनाव मे महत्वपूर्ण आधार बनते हैं ।

§ 5

HAHNEMANN Useful to the physician in assisting him to cure are the particulars of the most probable exciting cause of the acute disease, as also the most significant points in the whole history of the chronic disease, to enable him to discover its fundamental cause, which is generally due to a chronic miasm. In these investigations, the ascertainable physical constitution of the patient (especially when the disease is chronic), his moral and intellectual character, his occupation, mode of living and habits, his social and domestic relations, his age, sexual function, etc., are to be taken into consideration.

सूत्र ५-रोग के मूल कारण की खोज

रोग नया हो या पुराना चिकित्सक को बीमारी के मूल कारणॊं की खोज करना नितान्त आवशयक  है । नये रोगों मे रोग उत्पन्न करने और रोग को उत्तेजना देने वाले कारणॊं पर तथा पुरानी बीमारियों मे रोग के इतिहास पर चिकित्सकों को बहुत अधीरता और सावधानी से विचार करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने पर ही रोग के मूल कारण का पता लग सकता है । वस्तुत: चिकित्सक को रोगी की शरीर रचना और प्रकृति – गठन , शक्ति , स्वभाव , आचरण , च्यवसाय , रहन सहन , आदतें , समाजिक तथा परिवारिक संबन्ध , आयु, ज्ञान्निद्र्यों के व्यवाहार पर पूरी तरह से विचार कर लेना चाहिये ।

    § 213

    We shall, therefore, never be able to cure conformably to nature – that is to say, homoeopathically – if we do not, in every case of disease, even in such as are acute, observe, along with the other symptoms, those relating to the changes in the state of the mind and disposition, and if we do not select, for the patient’s relief, from among the medicines a disease-force which, in addition to the similarity of its other symptoms to those of the disease, is also capable of producing a similar state of the disposition and mind.1

    1 Thus aconite will seldom or never effect a rapid or permanent cure in a patient of a quiet, calm, equable disposition; and just as little will nux vomica be serviceable where the disposition is mild and phlegmatic, pulsatilla where it is happy, gay and obstinate, or ignatia where it is imperturbable and disposed neither to be frightened nor vexed.

सूत्र २१३ – रोग के इलाज के लिये मानसिक दशा का ज्ञान अविवार्य

इस तरह , यह बात स्पष्ट है कि हम किसी भी रोग का प्राकृतिक ढंग से सफ़ल इलाज उस समय तक नही कर सकते जब तक कि हम प्रत्येक रोग , यहां तक नये रोगों मे भी  , अन्य लक्षणॊं कॆ अलावा रोगी के स्वभाव और मानसिक दशा मे होने वाले परिवर्तन पर पूरी नजर नही रखते । यादि हम रोगी को आराम पहुंचाने के लिये ऐसी दवा नही चुनते जो रोग के सभी लक्षण  के साथ उसकी मानसिक अवस्था या स्वभाव पैदा करनेच मे समर्थ है तो रोग को नष्ट करने मे सफ़ल नही हो सकते ।

सूत्र २१३ का नोट कहता है :

ऐसा रोगी जो धीर और शांत स्वभाव का है उसमे ऐकोनाईट और नक्स कामयाब नही हो सकती , इसी तरह एक खुशमिजाज नारी मे पल्साटिला या धैर्यवान नारी मे इग्नेशिया  का रोल नगणय ही  रहता है क्योंकि यह रोग और औषधि की स्वभाव से मेल नही खाते ।

यही कारण है कि  पोलिक्रेस्ट होम्योपैथिक दवाओं अपना अलग-२ स्वभाव  को दिखलाती हैं । हिपोक्रेट के इस विभाजन को हैनिमैन , केन्ट , हेरिंग और ऐलेन ने मैटेरिया मेडिका मे जगह –२ प्रयोग किया है । जैसे पल्साटिला के बारे मे हैनिमैन लिखते हैं , “ Pulsatilla  is suited to a low , tearful , changeable , plegmatic temparemt “ और फ़ास्फ़ोरस के बारे मे लिखा “ quick movements , rapid resolutions , and a cheeful mood are more often found in phosphorous . औषधियों के स्वभावों को जानने के लिये मैटेरिया मेडिका का अध्यन्न तो अनिवार्य शर्त है और उससे बढकर रिपर्टेरी मे MIND SECTION मे चिन्हित उन रुब्रिक्स को समझना और रोगी की भाषा मे बदलने की माहरत होनी चाहिये ।

Visible Code” in Repertorial Perspective - Important Rubrics

Mind Chapter

1. Activity, Mental

2. Actions, behaviour

3. Agony, anguish

4. Alert, mentally

5. Anger

6. Answers, general

7. Antics, plays

8. Anxiety

9. Automatic, behaviour

10. Aversion, general

11. Awkward

12. Bashful

13. Bites

14. Boredom, ennui

15. Busy

16. Caressed, agg.

17. Cheerful

18. Childish, behaviour

19. Clinging

20. Clothed, improperly

21. Crying

22. Dancing

23. Faces, makes

24. Frown, disposed to

25. Gestures, makes

26. Gloomy, morose

27. Grimaces, makes

28. Hatred feelings

29. Hurried

30. Hyperactive, children

31. Impolite

32. Indifference

33. Kicking, behaviour

34. Laughing, behaviour

35. Laziness, indolence

36. Moaning

37. Mocking

38. Plays, with his fingers

39. Rage

40. Restlessness

41. Screaming, shrieking

42. Serious, behaviour

43. Shameless

44. Sighing, emotional

45. Singing

46. Sit, inclination to

47. Sits, general

48. Speech, general

49. Smiling

50. Suspicious

51. Sympathetic

52. Torpor

53. Violent, behaviour

54. Walking, behaviour

55. Washing, hands

56. Whistling

57. Witty

58. Yielding

(II) Children chapter

(III) Legs

(IV) Limbs

(V) Generals

 source : murphy repertory

courtesy : Dr Rajoo Kulkarani -body language and homeopathy PPS cure 7

मैटेरिया मेडिका और रिपर्ट्री मे इन चार constitutions से संबधित रुब्रिकस और औषधियों के बारे मे विस्तार से ग्रुप दिये हैं जैसे synthesis में : :source -synthesis 9

  • सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament):  Rubric mentioned under cheerful/confident/optimistic
  • फ़ेलेगमेटेक टेम्परामेन्ट ( phlegmatic Temperament) : Rubric mentioned under dullness /indifference/slowness
  • कोरिक टेम्परामेन्ट (Choleric Temperament) : passionate
  • मेलोन्कोलिक टेम्परामेन्ट (Melancholic Temperament) : despair/ grief / sadness

 

संभावित औषधियाँ : source -murphy repertory :

 Constitutions - CHOLERIC, constitutions
acon. ars. aur. BRY. carb-v. Caust. CHAM. coff. FERR. Hep. HYOS. kali-p. Kalm. Lach. Lyc. nat-m. Nit-ac. NUX-V. Phos. Plat. sec. Sil. sulph.

 Constitutions - SANGUINE, constitutions
Acon. ars. aur. Calc. calc-p. Cham. chin. Chinin-s. Coff. FERR. HYOS. Ign. murx. Nit-ac. Nux-v. PHOS. plat. Puls. Sang.

 Constitutions - PHLEGMATIC, constitutions
aloe Am-m. ant-t. Bell. calad. CALC. Caps. Chin. Clem. cocc. cycl. Dulc. ferr-p. hep. kali-bi. kreos. Lach. Merc. mez. Nat-c. Nat-m. PULS. seneg. Sep.

 Constitutions - MELANCHOLIC, constitutions
Acon. anac. AUR. Aur-m. bell. Bry. Calc. chin. cocc. Colch. Graph. IGN. Lach. Lil-t. Lyc. murx. NAT-M. Plat. PULS. Rhus-t. staph. stram. Sulph. verat.

 

 pkt 2

Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें ।

Clinic : Meo Lodge , Ramadhin Singh Road , Daligunj , Lucknow
E mail : drprabhatlkw@gmail.com
Landline No : 0522-2740211. 0522-6544031
Mobile no : xxxxxxxxx

बवासीर या पाइल्स और होम्योपैथिक उपचार

Friday, 27 February 2009

 

बवासीर को आधुनिक सभ्यता का विकार कहें तो कॊई अतिश्योक्ति न होगी । खाने पीने मे अनिमियता , जंक फ़ूड का बढता हुआ चलन और व्यायाम का घटता  महत्व , लेकिन और भी कई कारण हैं  बवासीर के रोगियों के बढने में । तो सबसे पहले जाने बवासीर और उसके मूल कारण :

आंतों के अंतिम हिस्से या मलाशय की धमनी शिराओंके फ़ैलने को बवासीर कहा जाता है ।

बवासीर तीन प्रकर की हो सकती है

  • बाह्य पाइल्स: फ़ैली हुई धमनी शिराओं का मल द्वार से बाहर आना
  • आन्तरिक पाइल्स : फ़ैली हुई धमनी शिराओं का मल द्वार के अन्दर रहना
  • मिक्सड पाइल्स: भीतरी और बाहरी मस्से

कारण :

  • बहुत दिनों तक कब्ज की शिकायत रहना
  • सिरोसिस आफ़ लिवर
  • ह्र्दय की कुछ बीमारियाँ
  • मध, मांस, अण्डा, प्याज , लहसुन, मिर्चा, गरम मसाले से बनी सब्जियाँ, रात्रि जागरण , वंशागत रोग ।
  • मल त्याग के समय या मूत्र नली की बीमारी मे पेशाब करते समय काँखना
  • गर्भावस्था मे भ्रूण का दबाब पडना
  • डिस्पेपसिया और किसी जुलाब की गोली क अधिक दिनॊ तक सेवन करना ।

लक्षण

  • मलद्वार के आसपास खुजली होना
  • मल त्याग के समय कष्ट का आभास होना
  • मलद्वार के आसपास पीडायुक्त सूजन
  • मलत्याग के बाद रक्त का स्त्राव होना
  • मल्त्याग के बाद पूर्ण रुप से संतुष्टि न महसूस करना

बवासीर से बचाव के उपाय

कब्ज के निवारण पर अधिक ध्यान दें । इसके लिये :

  • अधिक मात्रा मे पानी पियें
  • रेशेदार खाध पदार्थ जैसे फ़ल , सब्जियाँ और अनाज लें | आटे मे से चोकर न हटायें ।
  • मलत्याग के समय जोर न लगायें
  • व्यायाम करें और शारिरिक गतिशीलता को बनाये रखें ।

अगर बवासीर के मस्सों मे अधिक सूजन और दर्द हो तो :

गुनगुने पानी की सिकाई करें या ’सिट्स बाथ’ लें । एक टब मे गुनगुना पानी इतनी मात्रा मे लें कि उसमे नितंब डूब जायें  । इसमे २०-३० मि. बैठें ।

होम्योपैथिक उपचार :

किसी भी औषधि की सफ़लता रोगी की जीवन पद्दति पर निर्भर करती है । पेट के अधिकाशं रोगों मे रोगॊ अपने चिकित्सक पर सिर्फ़ दवा के सहारे तो निर्भर रहना चाहता है लेकिन  परहेज से दूर भागता है । अक्सर देखा गया है कि काफ़ी लम्बे समय तक मर्ज के दबे रहने के बाद मर्ज दोबारा उभर कर आ जाता है अत: बवासीर के इलाज मे धैर्य और संयम की आवशयकता अधिक पडती है ।

नीचे दी गई  औषधियाँ सिर्फ़ एक संकेत मात्र हैं , दवा पर हाथ आजमाने की कोशिश न करें , दवा के उचित चुनाव के लिये एक योग्य होम्योपैथिक चिकित्सक पर भरोसा करें  ।

फ़्लो चार्ट को साफ़ और बडॆ आकार मे  देखने के लिये चित्र पर किल्क करें ।

१. बवासीर के मस्सों मे तकलीफ़ और अधिक प्रदाह : aconite, ignatia,acid mur, aloes, chamomilla, bell,acid mur, paeonia

२. खुजलाहट : arsenic, carbo, ignatia, sulphur
३. स्ट्रैंगुलैशन : belladona,ignatia, nux

४.रक्तस्त्राव में : aconite, millifolium,haemmalis, cyanodon

५. मस्से कडॆ : sepia

६. बवासीर के मस्सों का बाहर निकलना पर आसानी से अन्दर चले जाना : ignatia

७. भीतर न जाना : arsenic, atropine, silicea, sulphur
८. कब्ज के साथ : alumina, collinsonia, lyco, nux, sulphur

९.अतिसार के साथ : aloes,podo,capsicum

१०. बच्चों मे बवासीर  : ammonium carb, borax, collinsoniia, merc

११. गर्भावस्था मे बवासीर : lyco,nux, collinsonia , lachesis, nux

१२.शराबियों मे बवासीर : lachesis, nux

१३. वृद्धों मे बवासीर : ammonium carb , anacardium

मेरी डायरी से - 1- फ़ास्फ़ोरस ( phosphorous)

Monday, 9 April 2007

कभी-2 कुछ रोगी हमेशा एक समस्या बन जाते हैं और कभी-2 होम्योपैथिक औषधियों के परिणाम तो उससे भी अधिक आशचर्यचकित करने वाले होते हैं। अब श्रीमान ब्रीजेश को ही लें , पिछले कई सालों से अस्थमा ( bronchial asthma) से पीडित हैं और उम्र भी कुछ अधिक नहीं , मात्र 25 साल । अक्टुबर 2006 मे आप मेरे पास आये और चाहते हैं कि inhaler और bronchodilators से पूर्ण्तया छुट्कारा मिले ; जो वह कई सालों से ले रहे हैं। होम्योपैथिक तरीके से रोगी के लक्ष्णो को लिया गया जो निम्म थे :
Kent ] [Respiration]Difficult:Lying:Amel:
[Kent ] [Respiration]Difficult:Exertion:After:
[Kent ] [Respiration]Difficult:Walking:Agg:
[Complete ] [Generalities]Food and drinks:Sweets:Desires:
[Complete ] [Generalities]Food and drinks:Spices, condiments, piquant, highly seasoned food:Desires:
[Complete ] [Stomach]Heartburn:

रोगी के लक्षणों मे जो विशेष बात थी कि साँस फ़ूलने मे लेटने से आराम मिल रहा था और चलने -फ़िरने मे तकलीफ़ बहुत अधिक बढ जाती थी। इसके अलावा सीने मे जलन , खाने -पीने मे चटपटी चीजों का शौक भी था। एक बात और कि उस मौसम मे जब लखनऊ मे कोई विशेष ठंडक नही होती , वह कुछ अधिक कपडे पहने था।
रोगी जहाँ रह रहा था वह जगह स्वास्थ के लिहाज से कोई विशेष उपयुक्त नही थी, धूप का घर मे अभाव था और घर मे सीलन काफ़ी थी (hydrogenoid constitution ) ।खैर लक्षणो को रिपरटार्जेशन के लिये डाला गया और कम्पलीट रिपर्ट्री और केन्ट रिपर्ट्री की मदद ली गयी। Drug Filters को apply किया और जैसा उम्मीद थी कि Psorinum औषधि के विकल्प मे आयी । तो prescription कुछ इस तरह बना:
29-10-06 = psorinum 200 1*3 { 15 दिन मे एक बार }
nat sulph 6x 4 TDS { रोगी के hydrogenoid constitution को ध्यान रखते हुये दी गयी }

18-11-06= कोई विशेष आराम नही, औषधि बदली गई।
Nux vom 30 TDS
Nat sulph 6x
Blatta Q 10 बूंद तीन बार, आवशय्कता पडने पर { Blatta Q को palliation के लिये दिया गया ।}
22-12-06 = आराम और वह भी जब तक Blatta Q का असर रहे , जाहिर है कि यह सिर्फ़ अभी तक palliation ही था।

इस बार drug filters को apply नही करते हुये सामान्य रिपरटार्जेशन का सहारा लिया गया और दोनो रिपर्ट्री केन्ट और कम्पलीट को एक साथ प्रयोग किया गया , जिसकी आकृति नीचे है:
1
Ars, sulp,puls, phos मे से अब की बार phos देने का मन बनाया , क्योकि इसकी वजह नीचे दी गयी आकृति से स्पष्ट है :
2

25-12-06= Phosphorous 1000 {15 दिन मे एक बार }
Nat sulp 6x 4 TDS
10-1-2007= अब की बार रोगी सन्तुष्ट दिखा, इन 5 दिन के दौरान उसे न तो उसे inhalers का प्रयोग करना पडा और न तो blatta Q को लेना पडा। Wheezing न के बराबर थी और उसकी जगह crepitations ने ले ली थी।
15-1-2007= Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS
22-2-2007 = Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS
16-3-2007 =Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS

Phosphorous 1000 ने जैसा कि अब तक लग रहा है कि फ़िलहाल रोगी को अब तक अस्थमा की समस्या से छुटकारा देने मे उपयुक्त औषधि है। अभी यह रोगी इन औषधियों का नियम से सेवन कर रहा है ।
लेकिन यह रोगी होम्योपैथिक दृष्टिकोण से मेरे लिये कई प्रशन खडे कर गया जिसका जबाब मै ढूँढ रहा हूँ ।
प्रशन 1- होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे यह कही भी वर्णित नही है कि फ़ाफ़्फ़ोरस मे साँस फ़ूलने मे लेटने से आराम मिलता है (dyspnoea > lying down )नीचे देखें। हाँ , Generalities मे अवशय लक्षण लेटने से और वह भी दायीं करवट लेटने से आराम दिलाते हैं (> Lying on right side ) और बायीं करवट से तकलीफ़ बढती है।
3
ऊपर आकृति न 2 मे केन्ट रिपर्ट्री इस लक्षण को कवर नही कर रहा है बल्कि कम्पलीट रिपर्ट्री मे यह आराम दिखा रहा है, यह कैसे हुआ। क्या यह clinical verification मे आया है । इसका जबाब मेरे पास नही है। लेकिन यह भी सच है कि रोगी को कम्पलीट रिपर्ट्री के भले ही clinical verification के जरिये से ही सही; रोग मे पूर्णतया आराम मिला है। इस लक्षण को मैने ग्रीस (Greece)के डा जार्ज विथेलीकोस (Dr George Vitholuks) से जबाब जानने के लिये एक हफ़्ते पहले मेल किया था और उनके जबाब की मुझे प्रतीक्षा है । इसके अलावा जो होम्योपैथिक चिकित्सक इस ब्लाग से गुजर रहे हो , वह भी मुझे बताये कि क्या वजह रही कि लक्षण मेटेरिया मेडिका मे न हiने के बावजूद रोगी को आराम दे गया। आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।

नये रोगों(Acute Diseases) मे मदर टिन्चर के प्रयोग और कई महत्वपूर्ण डाऊनलोड लिंक

Monday, 26 March 2007

नये रोगों मे सही सिमिलिमम का चयन करना होम्योपैथिक चिकित्सकों के लिये और विशेष नये चिकित्सक के लिये हमेशा एक सरदर्द सा रहता है । पुराने रोगों (Chronic Diseases)मे सिमिलिमम को रिपरटारिज करके चयन के लिये पर्याप्त समय होता है लेकिन नये रोगों मे एक चिकित्सक के पास इतना समय नही होता कि वह सही सिमिलिमम का चयन करे और उसका नतीजा कि आरम्भ मे ही रोगी का विशवास अपने चिकित्सक से ऊठ सा जाता है। बहुत से होम्योपैथिक चिकित्सक मदर टिन्चर का प्रयोग करके अपनी इस मुसीबत से काफ़ी हद तक छुटकारा पा रहे हैं। मदर टिन्चर यानी औषधि का मूल रूप का प्रयोग , हाँलाकि होम्योपैथी के सिद्दातों से बहुत हद तक इसकी पटरी नही खाती लेकिन फ़िर भी इनके निष्कर्ष जल्दी आते हैं। और सबसे बडी बात यह कि इनमे एक रोगी के लक्षणों को औषधि के लक्षणों से मिलाने की कोई बहुत अधिक आव्शय्कता नही पडती ।
मदर टिन्चर के प्रयोगों पर कोई बहुत अधिक संग्रह पुस्तकों का नही दिखता , Anshutz की New , Old & Forgotten Remedies ( प्रकाशक-Indian Books & Periodicals Syndicate ) , डा घोष की Drugs Of Hindustaan , Erlie Jones और यदुवीर सिन्हा की मदर टिन्चर पर पुस्तक थोडी बहुत जानकारी अवशय देती है, लेकिन Anshutz की New , Old & Forgotten Remedies और डा घोष की Drugs Of Hindustaan को छोडकर बाकी पुस्तकें जानकारी के मामले मे अपर्याप्त ही है ।
फ़ेल्टर की कम्पलीट मैटेरिया मेडिका टिन्चर प्रेमियों के लिये एक वरदान सी है। कल पाकिस्तान के डा मन्सूर अहमद ने यह महत्वपूर्ण लिंक भेजा है। सम्पूर्ण पुस्तक यहाँ से डाऊनलोड करें और पुस्तक को आनलाइन यहाँ पर देखें.

Arizona South West School Of Botanical Medicine के माइकल मूर ने फ़रवरी 1-2007 को साईट को अपडेट किया है, कई महत्वपूर्ण लिंक इस पेज पर है जो होम्योपैथिक चिकित्सकों के काफ़ी काम आ सकते हैं।

इसके अलावा शिकागो के Ellingwood की थेरापियूटिक्स और मैटेरिया मेडिका को भी Acrobat .pdf files मे यहां से डाऊनलोड कर सकते हैं और अगर इसको html मे देखना चाहें तो यहाँ देख सकते हैं।
ईलिगवूड की थेरापियूटिक्स के महत्वपूर्ण ग्रुप नीचे दिये हैं:



the.gif
Group I - Agents Acting on the Nervous System - 205 pages - 432K
1-1-Antipyretics.pdf
1-2-Analgesics.pdf
1-3-Sedatives.pdf
1-5-Minor nerve tonics.pdf
1-7-Reproductive Sedatives.pdf
2-1-Nerve Stimulants.pdf
2-2-Alcohol-antimalarials.pdf
2-3-Circulatory Stimulants.pdf
3-1-Tonic Stimulants.pdf
3-2-Sedative Stimulants.pdf
Antipyretics chart.pdf - 20k

Group II - Agents Acting Upon the Heart - 40 pages - 92K
1-Heart Agents.pdf
2-Heart Agents.pdf
Heart Remedy Chart.pdf

Group III - Agents Acting Upon the Respiratory Tract - 53 pages - 120K
1-Nauseating Expectorants.pdf
2-Mucosa Stimulants.pdf
3-Mucosa Stimulants.pdf
4-Sedatives and Tonics.pdf
5-Sedatives and Tonics.pdf

Group IV - Agents Acting upon the Stomach - 57 pages - 128K
1-Stomachics.pdf
2-Minor Stomach Tonics.pdf
3-GI Sedatives.pdf
4-Anti-emetics.pdf
5-Emetics.pdf
7-Digestives.pdf

Group V - Agents Acting upon the Intestinal Glandular Organs and the Canal - 84 pages - 188K
1-Laxatives-Cathartics.pdf
2-Liver Stimulants.pdf
3-Mild Liver Stimulants.pdf
4-Hydragogue Cathartics.pdf
6-Intestinal Astringents.pdf
7-Astringent Tonics.pdf
8-Hemostatic Astringents.pdf
Liver Herb Chart.pdf

Group VI - Agents Influencing the Character of the Blood - 90 pages - 204K
1-Antiseptic Alteratives.pdf
2-Glandular Alteratives.pdf
3-Special Glandulars.pdf
4-Antiseptic Alteratives.pdf
5-Special Alteratives.pdf
6-Antirheumatic Alteratives.pdf

Group VII - Agents Acting Upon the Genitourinary Organs - 62 pages - 140K
1-Renal Stimulants.pdf
2-Renal Stimulants.pdf
3-Stimulant-Sedatives.pdf
4-Sedatives-Correctives.pdf
5-Renal Correctives.pdf
6-Renal Correctives.pdf
7-Special remedies.pdf

Group VIII - Agents Used for Their Influence Upon the Skin - 19 pages - 56K

Group IX - Agents Acting upon the Female Reproductive Organs - 22 pages - 60K
Reproductive Herb Chart.pdf

Group X - Agents Acting upon Intestinal Parasites-Anthelmintics - 10 pages - 32K

प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग-5

Friday, 27 October 2006

साराका इंडिका
asoka

सामान्य नाम : अशोक
संस्कृत : अशोक, ककली
हिन्दी : अशोक
परिवार : सिसलपीनियोसि

विवरण :अशोक के वृक्ष का उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रंथों मे काफ़ी व्यापक रूप से हुआ है। प्राचीन ॠषियों ने मासिक धर्म सबधित रोगों मे इसकी प्रभावकारिता के लिये गुणगान किया है। इस वृक्ष के छिलके एव फ़ल से यह औषधि बनाई जती है।

होम्योपैथिक उपयोग:
कोलकाता के डा डी एन राय को इसका आशिक प्रमाणन का श्रेय दिया जाता है।

स्त्री रोग-
शवेत प्रदर- Sacrum मे दर्द के साथ गाढा, सफ़ेद एव खून मिश्रित स्त्राव
मासिक -(menstrual cycle)-
अनियमित मासिक , अधिकतर मासिक रूक जाना या कम होना, पेट के निचले हिस्से मे असहनीय दर्द जो मासिक धर्म के बहुत पहले शुरू हो जाता है।

बवासीर-
खूनी बवासीर मे इसका प्रयोग प्रमाणित है। मल्त्याग के बाद कष्ट एव खुजली। सख्त एव दुस्धाय कब्ज

पोटेन्सी-
Q,30

प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग- 4

Thursday, 5 October 2006

4: साइनोडोन डैक्टाइओन (Cyanodon D )

durban_grass

सामान्य नाम-दुर्बा
संस्कृत- ग्रंथि,दूबा
हिन्दी- दूब, हरियाली
अंग्रेजी-Bahama grass
परिवार-ग्रैमिनिया

विवरण-यह 2400 मीटर की ऊचांई तक पूरे भारत मे पायी जाने वाली एक बारह मासी घास है। यह दो प्रकार की होती है-हरा और सफ़ेद्। पशिचमी पंजाब के बलुयी
क्षेत्र को छोड कर यह पूरे भारत वर्ष मे पायी जाती है। यह ठंडे मौसम मे कम होती है तथा सडक के किनारे देखी जा सकती है।
पर्परागत रूप से आर्युवेद मे नासारक्त्स्त्राव, रक्तस्त्राव, दस्त और पेचिश मे इसका उपयोग होता रहा है।
एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली मे भी इसके व्यापक प्रमाण मिलते हैं। मूलत: इसका प्रयोग के प्रमाण खुजली,सिफ़लिस और डाइयूरिटिक( मूत्र बढाने के लिये) के लिये मिलते हैं।

होम्योपैथिक प्रयोग:-
डा शरत चन्द्र घोष की ' Drugs of Hindustan ' मे इस औषधि का उल्लेख है तथा डा जुगल किशोर ने कुछ रोगियों पर प्रमाणित भी किया है। C.C.R.H. द्ववारा पाँच विभिन्न केन्द्रों मे विस्तार से इसका प्रमाणन किया गया है।
नासारक्त्स्त्राव, चोट से खून बहना आदि मे रक्त्स्त्रावरोधी के रूप मे इस औषधि को सत्यापित किया गया है।

नासारक्त्स्त्राव (Epistaxis)- सुर्ख लाल रक्त ।

दस्त-आरभिक अवस्था मे। पेचिश के साथ, रक्त मिश्रित पतला और जलीय मल , भूख मे कमी तथा पित्ग्रस्त मितली। कोलाइटिस मे प्रभावी। इसके अलावा खूनी पेचिश मे भी प्रभावी है.

पोटेन्सी- :- Q,6x

प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग-3

Monday, 2 October 2006

जस्टीसैया एधोटा [ Justicia Adhatoda ]
vasaka

सामान्य नाम-वसाका
अंग्रेजी-Malabhar Nut
हिन्दी-अरूशा
वनस्पति परिवार-अकेन्थेसी

विवरण :-
यह एक छोटा पौधा हैजो ठंडे मौसम मे फ़लता फ़ूलता है। पांरपरिक रुप से लम्बे समय से श्वास समस्याओं का उपचार इस औषधि से किया जाता है।

होम्योपैथिक उपयोग:-
डा शरत चन्द्र घोष, कलकत्ता को होम्योपैथिक मेटेरिया मेडिका मे लाने का श्रेय जाता है। होम्योपैथिक प्रमाणन एव चिकित्सा सत्यापन से ऊपरी शवसन तंत्र के बहुत सारे लक्षण प्रकाश मे आये हैं।

नासाशोध- लगातार छींक आने के साथ नाक से धारा प्रवाह एंव अत्याधिक स्त्राव्। नाक मे सूजन एंव अवरुधता। स्वाद और सूघने की क्षमता मे कमी। गला, मुख,जिह्वा सफ़ेद रग से लेपित हो जाती है।

खाँसी – दम घुटने एंव छाती मे घडघडात तथा खाँसी के दौरे, उल्टी के साथ आराम । खाँसी का वेग रात मे अधिक्। रक्त युक्त बलगम्। तपेदिक और दमा की शुरुआत मे कारगर।

पोटेन्सी-6 , Q

प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग-2

Friday, 29 September 2006

ईगल फ़ोलिया(AEGLE FOLIA)

AEG;LE FOLIA

सामान्य नाम-बेलपत्र
अंग्रेजी-Bengal quince
हिन्दी -बेल
वनस्पति परिवार- रूटेसी


विवरण:
यह सिर्फ़ भारत मे ही पाया जाता है और हिमालय के आसपास कम ऊँचाई के जंगलो मे बहुतायत मे पाया जाता है। इसका धार्मिक महत्व भी है।
इस पेड का फ़ल मुख्यता दस्त और पेचिश का उपचार करने मे प्रयोग होता है। चिकित्सा प्रयोजनों के लिये अधिकाशत: आधा पका फ़ल प्रयोग किया जाता है। इस पेड के फ़ल से ईगल मार्मिलोस और पतियों से ईगल फ़ोलिया तैयार किया जाता है।

होम्योपैथिक उपयोग:
ईगल मार्मिलोस की तरह यह औषधि भी पेचिश और बवासीर मे प्रभावकारी पायी गई है।

पेचिश(Amoebic dysentry):
रक्त एव बलगम मिश्रित पतले मल के साथ शूलकारी दर्द्। भोजन ग्रहण करते ही मलत्याग की इच्छा शुरु हो जाती है और मलत्याग करने से आराम मिल जाता है( Colitis)

बवासीर (Piles):
खुजलीयुक्त, दर्दनाक एव फ़ुंसीनुमा। कब्ज, सख्त एव अल्प मल्।

शवेतप्रदर(Leucorrhoea):
जलन के साथ सफ़ेद स्त्राव जो ऐडी तक पहुँच जाता है। सुधार- लेटने से

माइग्रेन ( Migraine)
पित्तीय वमन के साथ कनपटी मे फ़डकन की तरह का दर्द्। इअसके बाद कमजोरी का अनुभव्।

पोटेन्सी- 6, Q

प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग

Wednesday, 27 September 2006

प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग


इधर कुछ वर्षों से होम्योपैथी मे प्राचीन भारतीय औषधियाँ का चलन बढा है। CCRH ने होम्योपैथी तरिको से इनका प्रमाणन किया है और सबसे खास बात यह है कि इनको प्रयोग करने के लिये कोई लक्षणों को मिलाने की आवशयकता नही पडती, सीधे दवा अपने निशाने पर जा लगती है। लेकिन इनका उपयोग नये मर्जों मे कामयाब है पर पुराने एव जटिल रोगों मे लगभग नगण्य ही है। एक होम्योपैथिक चिकित्सक के सामने सबसे कठिन क्षण नये रोगो मे ही होते है जहाँ लक्षणो को लेना संभव नही होता है, वहाँ इनका प्रयोग सार्थक है। जो होम्योपैथिक चिकित्सक इस ब्लाग से गुजर रहे है वह यह पोस्ट और आने वाली कई पोस्ट पर नजर रखे, यह उनकी प्रैकेटिस मे सहायक हो सकती है। अगर हिन्दी मे समझने मे दुशवारी आ रही हो तो अंग्रेजी मे यहाँ देखे।
1- एबोमा एगेस्टा( Abroma Augusta)


सामान्य नाम-उलट कम्बल
अंग्रेजी-Devil's Cotton
हिन्दी-उलट कम्बल
वनस्पति परिवार-स्टकयूलियसी

विवरण:
यह अधिकांशतः भारत के गर्म प्रदेशों मे पाया जाता है। इसके जड की छाल औषधीय उद्देश्यों के लिये प्रयोग होती है। स्वदेशी पद्दति मे यह आर्त्वजनक(emmenagogue) के रुप मे लोकप्रिय है। यह कृष्टार्त्व के रक्त्सकुलता एव तत्रिका प्रकार(dysmenorrhoea) मे एक लाभदायक औषधि है। मधुमेह (diabetes mellitus & inspidus) मे भी इसका प्रयोग सार्थक है।

होम्योपैथिक उपयोग-
कलकत्ता के डा0 डी0 एन0 रे द्वारा 1919 मे तथा नई दिल्ली के डा0 जुगल किशोर द्वारा 1972 मे आशिक प्रमाणन किये थे। बाद मे C.C.R.H.( सेन्र्टरल काउनसिल आफ़ रिसर्च इन होम्योपैथी) द्वारा भी इसका प्रमाणन किया जा चुका है तथा कृष्टार्तव(dysmenorrhoea ) एव शवेतप्रदर ( leucorrhoea)के लक्षणो के लिये लाभदायक है। सत्यापन परीक्षणो के दौरान भी इसकी पुषिट हो चुकी है।

मधुमेह(diabetes)-
अत्याधिक मूत्र उग्रता-रात मे तथा अत्याधिक घनत्व के साथ्। शुष्क मुख और प्यास अधिक्। रोगी को अनिद्रा और विषाद की शिकायत रहती है तथा रोगी को किसी प्रकार का मानसिक अथवा शारिरिक परिश्रम करने की इच्छा नही होती है। रोगी मानसिक रुप से भुलक्कड और चिडचिडा हो।

कृष्टार्तव (dysmenorrhoea )-
पेट के नीचे हिस्से मे शूलकारी दर्द्। अनियमित मासिक धर्म्। गहरा एव थक्केदार रक्त्।

शवसनी-शोध(bronchitis)-
खासने पर छाती और आसपास मे दर्द्। तेजी से साँस का चलना एव उजला बलगम्।

पोटेन्सी- Q,6
आगे जारी…