Showing posts with label होम्योपथी. Show all posts
Showing posts with label होम्योपथी. Show all posts

वर्ष 2013-14 सहित बारहवीं पंच वर्षीय योजना के दौरान आयुष विभाग की प्राथमिकताएं

Friday, 3 May 2013

वर्ष 2013-14 सहित बारहवीं पंच वर्षीय योजना के दौरान आयुष विभाग की प्राथमिकताएं

देश के कोने-कोने में प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण स्वास्थ्य के दायरे में लाना बाहरवीं पंच वर्षीय योजना की एक प्राथमिकता है। इस दौरान आयुष चिकित्सा प्रणाली की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए उसे आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ-साथ प्रयोग में लाया जाएगा। रोगों से बचाव, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ व्यक्तियों को ध्यान में रखते हुए नॉन कम्यूनिकेबल बीमारियों में, तनाव के प्रबंधन में, मानसिक रोगों की चिकित्सा में, बीमारियों से जूझते व्यक्तियों की देखभाल में और स्वस्थ्य लाभ में आयुष का प्रयोग किया जाएगा।

बारहवीं पंच वर्षीय योजना के महत्वपूर्ण उद्देश्य : -

बाहरवीं पंच वर्षीय योजनाओं में आयुष के लिए 10,044 करोड़ रूपये का प्रावधान रखा गया है। जबकी ग्यारहवीं पंच वर्षीय योजना में केवल 2994 करोड़ रूपये ही जिन उद्देश्यों के लिए खर्च किए गए वे हैः

1. स्वास्थ्य सेवाओं में आयुष के प्रयोग को बढ़ाया गया।

2. आयुष विभाग ने आयुष की विशेषताओं को चिकित्सा, विशेषतौर पर महिलाओं बच्चों और बुजुर्गों के लिए, मानसिक बीमारियों के चिकित्सा में, तनाव के प्रबन्धन में, बीमार व्यक्तियों की देखभाल में और पुनर्वास में किया।

बारहवीं पंच वर्षीय योजना के अंतर्गत जो सुझाव दिए गए हैं उनमें इन संस्थाओं को शुरू करने की सिफारिश की गई है : -

1. होमियोपैथी मेडिसिन फार्मास्यूटिकल कंपनी लिमिटेड

2. अखिल भारतीय योग संस्थान

3. अखिल भारतीय होमियोपैथी संस्थान

4. अखिल भारतीय यूनानी चिकित्सा संस्थान

5. राष्ट्रीय सोवा रिग्पा संस्थान

6. राष्ट्रीय औषधीय पौध संस्थान

7. राष्ट्रीय आयुष पुस्तकालय और अभिलेखागार

8. केंद्रीय सोवा रिग्पा अनुसंधान परिषद

9. आयुष संबंधित राष्ट्रीय मानव संसाधन आयोग

10. आयुष के लिए केंद्रीय दवा नियंत्रक

11. आयुष औषध प्रणाली का भारतीय संस्थान

12. राष्ट्रीय जराचिकित्सा संस्थान

13. मेटाबॉलिक तथा लाइफ-स्टाइल बीमारियों का राष्ट्रीय संस्थान

14. राष्ट्रीय ड्रग तंबाकू निवारण संस्थान

नए कार्यक्रम : आयुष के राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत कुछ और नए कार्यक्रमों की सिफारिश की गई है जो कि इस प्रकार हैः

1. आयुष ग्राम

2. फार्मेको विजिलेंश इनिशियेटिव फोर ए.एस.यू. ड्रग्स

3. शोध परिषद की इकाइयों को प्रभावी बनाना

4. राष्ट्रीय आयुष हैल्थ प्रोग्राम

5. अस्पताल और डिस्पेंसरी (आयुष के साथ-साथ राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन-एक फ्लेक्सिपूल)

source : http://www.pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?relid=21511

मुसीबत में है होम्योपैथी चिकित्सक …बना सर दर्द क्लीनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण और नियमन) अधिनियम,2010 - The Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act

Wednesday, 3 April 2013

आयुष पद्दतियों में से होम्योपैथी के लिये एक और बुरी खबर !! पिछ्ले कुछ सालों से अटपटे फ़ैसलों ने चिकित्सकों को सरदर्दी मे डल दिया है । सबसे पहली मार माननीय उच्चतम न्यायालय ने पौंडं पैंकिंग ( ४५० मि.ली. ) की बिक्री पर रोक लगाकर लगाई , छोटी पैंकिग का चलन बढा , राज्य सरकारों को अधिक रेवन्यू की प्राप्ति हुई लेकिन होम्योपैथॊम्के लिये यह सरदद बन के रह गया , उसके बाद कुछ ही सालों के अब्न्दर केन्द्र ने   G.M.P. ( Good Manufacturing Practices ) के   अन्तर्गत होम्योपैथिक दवाओं पर expiry date  को अंकित करना आवशयक कर दिया । एक और बेतुका नियम , जब expiry होती ही नही तो इस चलन को क्यूं लागू किया !!

Do you want such act ?

लेकिन हाल मे ही उत्तर प्रदेश मे २८ फ़रवरी २०१३ से लागू भारत सरकार के  क्लीनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण और नियमन) अधिनियम, 2010 ने रही सही कसर पूरी कर दी । लेकिन यह सरदर्द मात्र होम्योपैथों के लिये नही बल्कि मेडिकल सेवा मे आने वाले हर उस प्रतिषठान की है जिसमॆ एलोपैथिक चिकित्सक , डेन्टल चिकित्सक, डाइगनोस्टिक सेन्टर  और आयुष पद्दतियों के सभी चिकित्सक शामिल हैं । एक बार राज्यों द्वारा अपनाने पर इस अधिनियम के अनुसार, राज्य सरकारें क्लीनिकल प्रतिष्ठानों के पंजीकरण के लिए प्रत्येक जिले में पंजीकरण प्राधिकरण की स्थापना करेंगी। किसी भी चिकित्सक  को क्लीनिकल प्रतिष्ठान चलाने के लिए इस अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना होगा।

अधिक जानकारी के लिये http://clinicalestablishments.nic.in/ पर जायें । हिन्दी में प्रारुप को डाऊनलोड करने के लिये हाँ जायें और अंग्रेजी मे डाउनलोड करें यहाँ से ।

एक्ट की नयी व्यवस्थाओं इतनी अधिक जटिल हैं कि इस के  अनुसार चिकित्सीय स्थापनों  को चलाना अब आसान नही रहा । उत्तर प्रदेश मे दम तोडती चिकित्सा आने वाले दिनों मे किस मोड पर होगी इसका अनुमान लगाना कोई मुशिकिल नही दिखता  । पहले से ही CPMT  मे अरुचि लेते छात्रों का मनूबल नयी व्यवस्था के चलते और भी घटॆगा । कुछ साल पहले जहाँ लाखों छात्र- छात्र्यें CPMT मे शरीक होते थे कुछ सालॊ मे यह प्रतिशत चन्द हजारों तक पहुँच चुका है ।

आखिर देखते है  कि क्या है यह अधिनियम और क्यूं इस एक्ट के लागू होने से आयुष चिकित्सकॊ को कठिनाईयों का सामना करना पडेगा ।

एक्ट क्या  है :

संक्षिप्त रुप मे समझें कि अब सरकार यह तय करेगी कि क्लीनिक चलाने के लिये आपके पास पर्याप्त जगह हो , प्रक्षिक्षत स्टाफ़ हो , क्लीनिक में शौचालय की व्यवस्था हो , आपातकालीन परिस्थितियों में अगर रोगी का इलाज क्लीनिक मे नही हो सकता है तो उसे पास के अस्पताल तक पहुँचाने के लिये एम्बुलेसं हो , आदि-२ ।

C.M.O. के पास यह अधिकार होगा कि अगर चिकित्सक एक्ट का पालन नही करता है तो उस पर पहली बार १०००० रु. , दूसरी बार ५०००० रु और तीसरी और अन्तिम बार ५ लाख रु तक का जुर्माना लगाया जाय ।

एक्ट के अनुसार यदि चिकित्सक मेडिकल सेवा के अलावा और किसी कार्य /कारोबार मे लिप्त पाया जायेगा तो उसे दुराचार ( misconduct ) की संज्ञा दी जायेगी :) section 68 part 1

What Is Clinical establishmentAct?

  • This bill makes it mandatory for each and every clinical establishment including every individual clinic, consulting chamber, laboratory or any other investigative or treatment place without indoor beds, nursing homes, hospital etc. by whatever name it may be called to register and follow minimum standards of infrastructure i.e. of space / equipment and qualified para medical staff.
  • It provides for mandatory registration of all clinical establishments, including diagnostic centers and  single-doctor clinics across all recognized systems of medicine both in the public and private sector  except those run by the Defense forces
  • As-is-where-is Initially, provisional registration would be granted within 10 days of application on ‘as- is-where-is basis upon receiving the application filed with supporting documents. Once standards have been notified, permanent registration would be provided to all those conforming to the notified standards.
  • To stabilize the emergencypatient (with its grammatical variations and cognate expressions) means, with respect to an emergency medical condition specified in clause (f), to provide such medical treatment of the condition as may be necessary to assure, within reasonable medical probability, that no material deterioration of the condition is likely to result from or occur during the transfer of the individual from one clinical establishment to other.
  • The registering authoritycan impose fines for non-compliance and if aclinical establishmentfails to pay the same, itwould be recovered as anarrear of land revenue.
  • Penalties for non registration :There are stringent and huge monitory penalties for non registration by any professional, which are more than many criminal penalties of IPC.For First Offence, 10,00 FOR SECOND 50,000,subsequent offenses Rs.5 Lakhs.
  • Any person serving in non registered establishment 25,000/-Disobeying any direction or obstruction to inspection Rs. 5 Lakhs.
  • Rajasthan and UttarPradesh have alreadyadopted the Act.
  • The state government is making an all out effort to crack the whip on private clinics and hospitals with an Act which would require them to declare the amount of fees they charge, the number of services they offer and get registration from the medical authorities to set up a health facility.
  • clinics and private hospitals will have to mention on a display board about the services they are providing and the fees they are charging for that.
  • The proposed Act envisages to have district level committees, which would include district collector, chief medical health officer and superintendent of police.
  • Act would also prescribe minimum quality standards of services at the private clinical establishments. A medical department official said under the Act, no one can open clinics and hospitals without applying for registration. For the first two years, the department would issue temporary registration and after two years, permanent registration would be provided.

होम्योपैथिक चिकित्सकों  के लिये एक्ट के ऋण पक्ष और कुछ सुझाव :

( केन्द्रीय होम्योपैथिक परिषद के सदस्य डां अनुरुद्ध वर्मा से बातचीत के आधार पर )

  • होम्योपैथी में अधिकतर क्लीनिक एकल चिकित्सकॊ द्वारा संचालित किये जाते हैं जिसमें से अधिकतर में चिकित्सक स्वंय ही औषधियों की डिस्पेन्सिंग करते हैं । ऐसी दशा में जब मानक तय किये जाये तब इन्हें एलोपैथी के मानकों पर न कसा जाये क्योंकि होम्योपैथी में कम स्थान , कम उपकरण , कम संसाधन आदि की जरुरत पडती है और चिकत्सक अपने क्लीनिक  से रोगी को औषधि उपलब्ध कराता है ।ऐसे मे होम्योपैथी के लिये क्लीनिक स्थापित करने के लिये अलग मानक तय करना चाहिये । यदि होम्योपैथी क्लीनिक पर एलोपैथी के मानक तय किये जायेगें तो क्लीनिक खोलना और चलाना कठिन हो जायेगा।
  • इस एक्ट मे होम्योपैथिक के अधिकारियों एवं संस्थाओं तथा प्रतिनिधियों को समुचित स्थान नही दिया गया है तथा जिला स्तर पर भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही है जिससे होम्योपैथिक चिकित्सकों के हितों की अनदेखी हो सकती है । एक्ट के अंतर्गत गठित होने वाली नेशनल कांउनसिल एवं जिला कमेटियों में एलोपैथी की प्रोफ़ेशनल संन्स्थाओं , अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया है परतुं नेशनल कांउनसिल मे भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के तीन सदस्यों को स्थान दिया गया है जबकि केन्द्रीय होम्योपैथिक परिषद के मात्र एक प्रतिनिधि को स्थान मिला है ।
  • होम्योपैथिक चिकित्सक के लिये प्रशिक्षित स्टाफ़ उपब्ध हो पाना भी संभव नही है क्योंकि होम्योपैथी मे फ़ार्मासिस्ट का कोई अधिकृत प्रशिक्षण नही है ।

मौजूदा हाल मे यह एक्ट होम्योपैथिक चिकित्सकों के लिये एक आधात से कम नही है । अधिक्तर मध्यम वर्गों से आने वाले छात्र / छात्रायें और उनके अभिवावक क्या इस बोझ को सह पायेगें ? आगे क्या होगा यह तो समय ही बतायेगा !!

Treating Acute infections in Homeopathy – एक्यूट संक्रमणॊं का होम्योपैथी मे उपचार

Monday, 26 September 2011

जुलाई से लेकर सितम्बर तक के ज्वरों मे लगभग एक तरह की  समानता देखी जाती है । ज्वर की प्रवृति मे तेज बुखार, ठंड लगने के साथ, तेज सरदर्द ,वमन , बदन का टूटना आदि प्रमुख्ता से रहते हैं . लेकिन कुछ विशेष अन्तर भी रहते हैं जिनके आधार पर इनकी पहचान की जा सकती है , विशेषकर उन इलाकों मे जहाँ महँगे जाँच करवाना संभव नही होता .

क्रं. मलेरिया डेगूं चिकिनगुनिया
1. ठँड से काँपना, जिसकी पहचान डाइगोनिस्टिक किट और ब्लड स्मीर से की जाती है . डॆगूं मे अधिकतर रक्त से संबधित समस्यायें होती हैं जैसे त्वचा पर छॊटॆ लाल दाग जो WBC और platelet की कमी से होते हैं . चिकिनगुनिया में जोडॊं ( संधिस्थलों ) मे दर्द और सूजन अधिक रहती है .
2.   डॆगूं का बढना जो WBC और PLatelet ( < 100000/L ) की संख्या मे कमी से लगाया जाता है . चिकनगुनिया में WBC और platelet की संख्या मे विशेष फ़र्क नही पडता.
3.   Positive Torniquet Test : Blood pressure cuff को पांच मिनटॊं तक systolic और diastolic blood pressure के बीच के अंक पर फ़ुलाये रखें . यदि प्रति स्कैवेर इंच मे दस से अधिक छॊटॆ लाल चकत्ते दिखाई दें तो जाँच का परिणाम निशिचित रुप से positive है .  

लेकिन अगर इस बार देखें तो ज्वर की प्रकृति अलग सी देखी गई है । गत वर्ष जहाँ  डॆगूं और चिकिनगुनिया का संक्रमण अधिक था वहीं इस बार मलेरिया के केस बहुतायात मे पाये गये । आम तौर से यह समझा जाता है कि होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति सिर्फ़ लक्ष्णॊं पर आधारित चिकित्सा पद्द्ति है और उसमे डाइगोनिसस का विशेष स्थान नही है । लेकिन यह सच नही है , विशेषकर एक्यूट रोगों मे डाइगोसिस आधारित चिकित्सा दवा के सेलेकशन मे मदद करती है और व्यर्थ  का कनफ़्यूजन  नही खडा करती । एक्यूट रोगों मे सेलेक्शन के विकल्प कई हैं ( नीचे देखें ) , इनमें क्लासिकल होम्योपैथी भी है , काम्बीनेशन  भी , मदर टिन्चर भी , क्या सही या या क्या गलत यह पूर्ण्तया चिकित्सक के विवेक पर निर्भर है , लेकिन अगर लक्षण स्पष्ट हों तो क्लासिकल को पहली पंसद बनायें नही तो और तरीके तो हैं ही :)

एक्यूट रोगों में सेलेकशन के विकल्प :

१. disease specific औषधियाँ:

specifics का रोल न होते हुये भी इस सच को नजरांदाज करना असंभव है कि कई एक्यूट रोगों मे इलाज disease specific ही होता है जैसे टाइफ़ायड मे baptisia , Echinacea , infective hepatitis में chelidonium , kalmegh  , Dengue  मे eup perf  , acute diarrhoea मे alstonia , cyanodon , आम वाइरल बुखार में Euclayptus  ,Canchalgua ,  मलेरिया के लिये  विभिन्न एर्टेमिसिआ (कोम्पोसिटी) प्रजातियां जैसे कि एर्टेमिसिआ एब्रोटनुम (एब्रोटनुम), एक मारिटिमा (सिना), एक एब्सिनठिअम (एब्सिनठिअम) , chinum sulph, china , china ars आदि ।

२. सम्पूर्ण लक्षण के आधार पर: (Totality of symptoms )

अक्सर होमियोपैथी चिकित्सा नीचे लिखे गए लक्षणो को ध्यान में रखकर दी जाती है –

  • ठंड और बुखार के प्रकट होने का समय
  • शरीर का वह भाग, जहां से ठंड की शुरूआत हुई और बढी।
  • ठंड या बुखार की अवधि
  • ठंड, गर्म और पसीना आने के चरणों की क्रमानुसार वृद्धि
  • प्यास/ प्यास लगना/ प्यास की मात्रा/ अधिकतम परेशानी का समय
  • सिरदर्द का प्रकार और उसका स्थान
  • यह जानना कि लक्षणों के साथ साथ जी मतलाना/ उल्टी आना/ या दस्त जुडा हुआ है या नहीं।

३. NWS ( Never well since ) :

अगर रोग का कारण specific हो जैसे रोगी का बारिश के पानी मे भीगना ( Rhus tox ) , दिन गर्म लेकिन रातें ठंडी ( Dulcamara ), ठंडी हवा लगने से (aconite ), अपच खाना खाने से ( antim crud , pulsatilla आदि )

४. रोगी की गतिविधि ( Activity ) , ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( Thermal  ), प्यास (Thirst )और मानसिक लक्षण में  बदलाव ( changes in mental attitude of the patient ) ;

डां प्रफ़ुल्ल विजयरकर का यह वर्गीकरण एक्यूट रोगों में संभवत: दवा सेलेकशन का सबसे अधिक कारगर तरीका है । लेकिन यह सिर्फ़ एक्यूट इन्फ़ेशन के लिये ही है , जैसा नीचे दिये चार्ट १ से स्पष्ट है कि यह indispositions और Acute Exacerbations of Chronic diseases  मे इसका कोई रोल नही है । प्रफ़ुल्ल के सूत्र आसान है , गणित की गणनाओं की तरह , रोग के दौरान रोगी की गतिविधि ( decreased , increased or no change ) , ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( Thermal : chilly / hot ) ,  प्यास (Thirst ( increased or decreased )  और मानसिक लक्षण में  बदलाव ( changes in mental attitude of the patient : diligent or non diligent ) पर गौर करें , और यह तब संभव है जब मैटेरिया मैडिका पर पकद मजबूत हो । उदाहारणत: एक रोगी जो तेज बुखार की हालत में सुस्त और ठंडक को सहन नही कर पा रहा है , प्यास बिल्कुल भी नही है और आस पास के वातावरण मे उसका intrest बिल्कुल् भी  नही है , उसका सूत्र  DCTL   (Axis : Dull +Chilly+thirstless ) होगा । इस ग्रुप में Sepia ,Gels ,Ac. Phos ,Ignatia ,Staph ,Ipecac ,Nat-Carb ,China  प्रमुख औषधियाँ हैं , चूँकि स्वभावत: वह किसी भी कार्य को करने मे अरुचि दिखा रहा है इस ग्रेड मे सीपिया प्रमुख औषधि होगी । जो चिकित्सक प्रफ़ुल्ल का अनुकरण करते हैं वह अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके सूत्र कितने प्रभावी हैं ।

DCTL   (Axis : Dull +Chilly+thirstless )
4)Sepia 5)Gels 6)Ac. Phos 7)Ignatia 8)Staph 9)Ipecac 10)Nat-Carb 11)China

DCT (Axis : Dull+chilly+thirsty)
12)Nux-vom 13)Eup-per 14)Phos 15)Calc-c 16)Bell 17)China 18)Silicea 19)Hyos

DHTL (Axis : Dull+hot+thirstless)
20)Puls 21)Bry 22)Apis 23)Lach 24)Sulph 25)Lyc 26)Thuja 27)Opium 28)Carbo-v

DHT ( Axis : Dull+hot+thirsty)
29)Bry 30)Nat. Mur 31)Sulph 32)Lyc 33)    Merc. S. 34)Apis   

विस्तार से यहाँ बताना संभव नही है लेकिन अधिक जानकारी के लिये यहाँ और यहाँ देखें ।

vjayakar-expert1

                           चित्र १ : Dr Praful Vijayakar’s Acute system :

            साभार : http://www.hompath.com/VFeatures.html

 

 

S. No Acute Infection  Indisposition Acute Exacerbations of Chronic disease
1 Viral  fevers, Influenza, tonsilitis ,Sore Throat, Typhoid,  Pneumonia, Pneumonitis, Lung Abscess , Septicaemia, Food poisoning,Infective diarrhoea, Dysentry,Urinary tract colics,  Pleurisy. Treatment not required

constitutional
required

 

 

                 ्चित्र २

flow chart of acute cases

                                                  चित्र३ ( Flow chart of Acutes by Dr Praful Vijarkar )

vijayakar-expert2  

                                      चित्र ४ साभार : http://www.hompath.com/VFeatures.html

     

किसी भी एक्यूट केस और विशेषकर संक्रमण रोगों मे हैनिमैन द्वारा प्रतिपादित आर्गेनान के तीन सूत्र  १०० -१०२ को पढने  से हैनिमैन की विचारधारा का स्पष्ट मूलाकंन किया जा सकता है । यह भी अजीब इत्फ़ाक है कि जिस आर्गेनान को डिग्री लेने के लिये सिर्फ़ पढा जाता हो उसका सही मूल्याकंन प्रैक्टिस के दौरान अधिक बेहतर तरीके से किया जा सकता है । :)

हैनिमैन लिखते है :

hanemann_thumb2

सूत्र १०० - महामारी और संक्रामक रोगों का उपचार -

महामारी और बडे पैमाने पर फ़ैलने वाले संक्रामक रोगों की चिकित्सा करने के सिलसिले मे चिकित्सक को इस जाँच पडताल के चक्कर मे नहीं पडना चाहिये कि उस नाम की या उस प्रकार की बीमारी का प्रकोप पहले हो चुका है या नही । इस प्रकार की जिज्ञासा व्यर्थ है क्योंकि उस जानकारी को आधार बना कर वर्तमान महामारी या रोग की चिकित्सा करना जरुरी नही । चिकित्सक को तो उसे एक नया रोग मान लेना चाहिये और यही मानकर उसे रोग का सम्पूर्ण चित्र अपने मस्तिष्क मे बैठाने का प्रयास करना चाहिये । इसी प्रकार किसी भी औषधि  का  वैज्ञानिक आधार करने के लिये यह जरुरी है कि वह उस औषधि को जाने और भली भाँति परीक्षण कर ले । चिकित्सक को अपने मन मे यह धारण कभी भी न बन्ननी चाहिये कि रोग बहुत कुछ पिछ्ले रोग से मिलता हुआ है तथा रोगी मे लगभग वही लक्षण विधमान है जो पहले किसी रोग मे हो चुके हों । यदि चिकित्सक सावधानी से रोगी का परीक्षण करेगे तो यह पायेगे कि कि यह नई माहमारी पिछली माहमारी से सर्वथा भिन्न्न है और लोगों ने भ्रम वश उसे एक ही नाम दिया है । यह भिन्नता संक्रामक रोगों के अतिरिक्त बडे पैमाने पर होने वाले अन्य रोगों मे भी पायी जाती है । परन्तु खसरा , चेचक आदि संक्रामक रोगों पर यह नियम नही लागू होता ।

§ 100

In investigating the totality of the symptoms of epidemic and sporadic diseases it is quite immaterial whether or not something similar has ever appeared in the world before under the same or any other name. The novelty or peculiarity of a disease of that kind makes no difference either in the mode of examining or of treating it, as the physician must any way regard to pure picture of every prevailing disease as if it were something new and unknown, and investigate it thoroughly for itself, if he desire to practice medicine in a real and radical manner, never substituting conjecture for actual observation, never taking for granted that the case of disease before him is already wholly or partially known, but always carefully examining it in all its phases; and this mode of procedure is all the more requisite in such cases, as a careful examination will show that every prevailing disease is in many respects a phenomenon of a unique character, differing vastly from all previous epidemics, to which certain names have been falsely applied - with the exception of those epidemics resulting from a contagious principle that always remains the same, such as smallpox, measles, etc.

सूत्र १०१- महामारी का निदान

बहुधा ऐसा होता है कि चिकित्सक किसी संक्रामक रोग से पीडित व्यक्ति  को पहली बार देखने पर समझ न पाये । लेकिन उसी प्रकार के कई रोगियों को देखने के बाद चिकित्सक को रोग के सभी लक्षण और चिन्ह याद हो जायेगें । यदि चिकित्सक  तीक्ष्ण निरीक्षण वाला है तो एक या दो रोगी को देखने के बाद ही रोग के लक्षण उसके मन मे अंकित हो जायेगें और अपनी इस  जानकारी के आधार पर वह सामान लक्षण वाली दवा का चुनाव कर सकेगा ।

§ 101

It may easily happen that in the first case of an epidemic disease that presents itself to the physician's notice he does not at once obtain a knowledge of its complete picture, as it is only by a close observation of several cases of every such collective disease that he can become conversant with the totality of its signs and symptoms. The carefully observing physician can, however, from the examination of even the first and second patients, often arrive so nearly at a knowledge of the true state as to have in his mind a characteristic portrait of it, and even to succeed in finding a suitable, homoeopathically adapted remedy for it.

सूत्र १०२ - माहामारियों के ल्क्षण

महामारियों से पीडित रोगियों के लक्षण  लिखते-२ चिकित्सकों के मस्तिष्क मे रोग का चित्र और भी अधिक स्पष्टता से उभर आता है । इस प्रकार लिखे गये विवरण से रोग की और ही विशेषतायें उभर कर आ जाती हैं परन्तु इसके साथ ही कुछ लक्षण ऐसे भी प्रकाश मे आते हैं जो केवल कुछ रोगियों मे प्रकट होते हैं और सभी रोगियों मे नही पाये जाते । अत: विभिन्न प्रकृति के अनेक रोगियों को देख कर रोग की यथार्थ जानकरी प्राप्त की जा सकती है ।

§ 102

In the course of writing down the symptoms of several cases of this kind the sketch of the disease picture becomes ever more and more complete, not more spun out and verbose, but more significant (more characteristic), and including more of the peculiarities of this collective disease; on the one hand, the general symptoms (e.g., loss of appetite, sleeplessness, etc.) become precisely defined as to their peculiarities; and on the other, the more marked and special symptoms which are peculiar to but few diseases and of rarer occurrence, at least in the same combination, become prominent and constitute what is characteristic of this malady.1 All those affected with the disease prevailing at a given time have certainly contracted it from one and the same source and hence are suffering from the same disease; but the whole extent of such an epidemic disease and the totality of its symptoms (the knowledge whereof, which is essential for enabling us to choose the most suitable homoeopathic remedy for this array of symptoms, is obtained by a complete survey of the morbid picture) cannot be learned from one single patient, but is only to be perfectly deduced (abstracted) and ascertained from the sufferings of several patients of different constitutions.

आर्गेनान के इन तीन सूत्रॊं को पढने के बाद हैनिमैन के "Genus Epidemics ' की परीभाषा को आसानी से समझा जा सकता है । संक्रामक रोगों मे एक ही सत्र मे चुनी गई औषधि जो कई रोगियों मे व्याप्त लक्षणॊं को कवर करती है  , जीनस इपीडिमिकस कहलाती है । यही कारण था कि पिछ्ले कई महामरियों मे होम्योपैथिक दवाओं ने अपना सर्वष्रेष्ठ असर दिखलाया ।

[slideshare id=1253218&doc=jayneyspresentation-090406033726-phpapp01]

मेरी डायरी - ईथूजा साइनाएपियम (Aethusa Cyanapium )

Saturday, 3 September 2011

क्या  एक रोगी की केस हिस्ट्री  एक कन्सलटेशन मे पूरी हो जाती है ?  बहुधा यह संभव नही हो पाता । पहली बार आया हुआ नया रोगी बहुधा उन लक्षणॊं को तरजीह  नही देता जिसको उसको लगता है कि उनकी महत्ता कम है । लेकिन २-३ कन्सलटेशन और रोगी के परिवार जनों के साथ वार्तालाप के बाद कै नये लक्षण प्रकाश मे आते हैं जिनसे आगे के केस को संभालना आसान हो जाता  है । हाँ , अलबत्ता उन रोगियों या उनके परिवार के लोगों मे जहाँ होम्योपैथिक की समझ होती है वहाँ परेशानी नही आती । यह चर्चा मै इस लिये कर रहा हूँ क्योंकि कई बार मुझे नये रोगियों के साथ इस तकलीफ़ से गुजरना पडा है । कुछ इसी तरह ६ वर्षीय सानिया के साथ हुआ । epileptic convulsions  या आक्षेपॊं  से पीडित सानिया का इलाज फ़रवरी २०१० से सितंबर २०१० के मध्य चला और इस के दौरान कई बार केस हिस्ट्री के आधार पर सही सिमिलमम को बदलना पडा और आखिरकार कुछ अप्रत्याशित से आक्षेपों मे कम इस्तेमाल होने वाली औषधि ईथूजा साइनाएपियम से वह पूरी तरह से स्वस्थ हुयी ।

aethusa

सम्पूर्ण केस को रखने  के पहले ईथूजा साइनाएपियम को स्मरण करना एक बार उचित होगा ।  यूरोप मे पायी जानी वाली एक साधारण सी घास  फ़ूल्स पार्सली ( fools parsley ) से यह औषधि तैयार की जाती है । नन्हें-२  बच्चॊ की यह सच्ची मित्र है क्योंकि यह उनकी बहुत सी समस्याओं से छुट्कारा दिलाती है विशेषकर दूध की उल्टी करने वाले शिशुऒं मे । शिशु जैसे ही दूध पीता है वह या तो वमन से भारी मात्रा मे निकल जाता है और अगर कुछ देर के लिये वह पॆट मे ठहर गया तो वमन जैसे जमे हुये दही के रुप मे होती है । प्यास न के बराबर और निद्रा का आवेश बहुत अधिक इसके प्रधान लक्षण हैं ।

aethusa intolerance of milk

इसके अलावा ईथूजा  ऐसे आक्षेपों मे भी उपयोगी रहती है निनमे अगूंठॆ भिंच जाते हैं और आँखे नीचे झुक जाती हैं । रोगी का हाव भाव एक खास पहचान लिये होता है । उसकी आखॆं धँसी होती हैं तथा नथूनॊ से मुख के कोणॊं तक खिंची दो स्पष्ट रेखाओं और ऊपरी ओंठ से घरे भाग मे मोती जैसी सफ़ेदी रहती है । इसे नासिका रेखायें  कहते हैं ।

 aethusa dullness during examination ईथूजा का प्रयोग ध्यान केंद्रित करने की शक्ति के अभाव मे भी रहता है और यही कारण है कि यह औषधि अकसर उन शिक्षार्थियों मे भी प्रयोग की जाती है जहाँ अवससन्नता , ध्यान केद्रितं करने का अभाव और एक खास तरह की गमगीनता रहती है ।

 love for animals लेकिन एक और लक्षण  भी है जिसकी नजर मेरी इस केस को लेते और repertorise करते हुये पडी । और वह है जानवरॊं से अथाह प्रेम । और यही इस रोगी कॊ ठीक करने प्रधान लक्षण साबित हुआ |

सानिया को जब उसके पिता दिखाने के लिये  पहली बार लाये तो वह अन्य बच्चॊ से अलग सी दिखी । अगस्त २००९ मे पहला आक्षेप पडा और उसके बाद यह सिलसिला लगातार ३-४ दिनों के अन्तराल पर चलता रहा । इस दौरान ऐलोपैथिक इलाज का सहारा लिया लेकिन आक्षेपों मे कमी न आयी । अन्तर अवशय बढ गया लेकिन इसके बावजूद आक्षेप  पडते रहे । ५ भाई बहनॊ मे ४ नम्बर मे यह लडकी का चेहरा और  स्वभाव कुछ अजीब सा दिखा । चेहरा तमतमाया हुआ जैसे लडने मे मूड मे हो , सन्तुष्ट किसी से भी नही , अकेले रहना पसन्द और अन्य भाई बहनों से पटरी बिल्कुल भी नही । ऐसा भी नही था कि परिवार मे उसके साथ कोई भेद भाव रखा जाता रहा हो । उसके पिता के अनुसार रोज नई –२ तरह की डिमांड , कभी नये मोजों की फ़रमाईश और कभी मुर्गी के बच्चॊ की । एक डिमाडं पूरी की जाती तो नयॊ डिमाडं खडी हो जाती । लडाई झगडा पडॊसियों के बच्चॊ से तो था ही लेकिन अपने भाई बहनों से भी पटरी नही खाती थी । घर मे किसी का समझाना तो मानो आफ़त सी खडी कर देता । और कम से कम मेरे किसी भी सवाल का जबाब उसने कभी भी ठीक से नही दिया ।

sania

रिपर्टर्जेशन के आधार पर Chamomilla ,  Staphysagria , Sepia , Carcinocin और Cina मे से कैमोमिला सबसे उपयुक्त औषधि के रुप मे ऊभरी । अत: पहला प्रिसक्र्पशन कैमोमिला २०० और pl  से किया गया । लेकिन १० दिन की समाप्ति पर न तो मानसिक लक्षणॊं मे और न ही आक्षेपों मे अपेक्षित परिणाम दिखाई दिये । आक्षेप पूर्वत: की तरह ४ दिन पर पडॆ । दूसरे सप्ताह की समाप्ति पर कैमोमिला के साथ Oenanthus crocata  Q और Artemesia vulgaris Q को जोडा गया । इस बार आक्षेप पहले की तुलना मे कम रहे लेकिन मानसिक लक्षण वैसे ही रहे |  इस १५ दिन के दौरान आक्षेप घट कर २ बार पर आ गये । यह क्रम अप्रैल मध्य तक चला , कभी आक्षेप कम और कभी अधिक ।

अप्रेल के महीने के अंत मे मुझे अचानक उसके घर पर उसकी माँ को देखने जाना पडा . जब मै उसकी माँ को देख कर कमरे से बाहर निकल रहा था तो मेरी नजर उस लडकी पर पडी . दरवाजे  के पास बैठी वह  दो बिल्ली के बच्चों को अपनी गोदी मे लेकर  सुलाने की कोशिश कर रही थी । मै एक क्षण  के लिये रुका और  एक  पल उसको  देखता रहा . कम से कम इतनी अवधि मे उसके चेहरे पर इतना भोलापन और सौम्यता कभी न देखी । वह बिल्कुल अबोध बच्चॊ की तरह शांत नजर आ रही थी । मुझे देखकर वह मुस्कराई और धीरे से मुझे सलाम किया । मै अपलक उसको देखता रहा और  वापस पल्टा और उसकी माँ से उसके इस व्यवहार के बारे मे पूछ्ने लगा । ’यही इसका स्वभाव है ,  कबूतरॊं , बिल्ली और अन्य जानवरों  के बच्चॊ को छॊडकर इसकी निभती किसी से नही  है ’, उसकी माँ बोली

मैं क्लीनिक वापस आया और सिन्थीसस रिपर्ट्री मे love for animals रुब्रिक को तलाशने लगा ।

MIND - ANIMALS - love for animals
aeth. ambr. bar-c. bufo calc. calc-p. carc. caust. lac-del. lac-f. lac-leo. limest-b. med. nat-m. nuph. phos. psor. puls. sulph. tarent.
MIND - ANIMALS - love for animals - talking to animals
aeth.

ईथूजा हर लक्षण को तो नही लेकिन  प्रमुखता से दिखने वाले rare, striking  और  characteristic लक्षणॊं को कवर कर रही थी  , वह आक्षेपों और विशेष मानसिक लक्षण love for animals को कवर कर रही थी लेकिन क्या ईथूजा वाकई मे उसकी दवा थी , थोडी सी और तलाश मे ईथूजा के मानसिक लक्षणॊं पर वृहद लेख Alexander Gothe and Julia Drinnenberg की Homeopathic Remedy Pictures में मिला । एक नजर :

    • patients requiring Aehusa are often loners who live a withdrawnlife , together with one or several animals.
    • This reclusion into solitude develops slowly, fuelled by personal dissapontments and a feeling of not being able to understand the society with its manifold ideas , opinions and trends . They feel different.
    • they find it hard to build up contacts and relationship with other people , to communicate with or show an intrest in others.
    • These patients have their own intense thoughts and feelings, but they timidily keep them to themselves because they think that no one understands them or wants to know.

    • Thus their  emotions are bottled up; they are unable to express them, and this unconscious conflict results in these people withdrawing further and further.
    • Eventually they avoid people . they become outsiders, compensate by acquiring many animals and dedicate their whole life to them.

    • In this way they construct a substitute world in which the company and affection of the animals render any need for contact with human beings superfluous.

    • Through their sensitive communication with the animals , these patients release their pent up emotions and achieve the kind of pleasure which they were not able to find with humans.
    • If they do not suceed in building this kind of community in order to relax emotionally , their emotional affections begin to emerge in the form of soliloquies or illnesses.

अप्रेल २०१० के मध्य मे चल रहे औषधियों को हटा कर ईथूजा १००० और pl दी गई और परिणाम अविस्मर्णीय रहे । मई तक आते –२ आक्षेप लगभग  बन्द हो गये और मुख्य बात कि रोगी के व्यवहार मे असाधारण परिवर्तन दिखाई दिया , अब तो न वह आक्रामक थी , न ही उसकी कोई अनावशयक  डिमाडं थी । अक्टूबर २०१० तक ईथूजा १००० को २ बार रिपीट करना पडा । सानिया आज पूर्ण्तया स्वस्थ है । अक्टुबर मे उसका इलाज बन्द कर दिया और उसके पिता को खासकर ताकीद दी कि अगर कोई व्यवहार मे कोई  परिवर्तन दिखे तो फ़िर तुरन्त मिले ।

मानसिक लक्षणॊं का आधार होम्योपैथिक प्रेसक्राइबिग  का प्रमुख घटक है ।

[slideshow id=504403158293269505&w=426&h=320]

आर्गेर्नान आफ़ मेडिसेन मे हैनिमैन ने लिखते  हैं :

§ 5

HAHNEMANN Useful to the physician in assisting him to cure are the particulars of the most probable exciting cause of the acute disease, as also the most significant points in the whole history of the chronic disease, to enable him to discover its fundamental cause, which is generally due to a chronic miasm. In these investigations, the ascertainable physical constitution of the patient (especially when the disease is chronic), his moral and intellectual character, his occupation, mode of living and habits, his social and domestic relations, his age, sexual function, etc., are to be taken into consideration.

सूत्र ५-रोग के मूल कारण की खोज

रोग नया हो या पुराना चिकित्सक को बीमारी के मूल कारणॊं की खोज करना नितान्त आवशयक  है । नये रोगों मे रोग उत्पन्न करने और रोग को उत्तेजना देने वाले कारणॊं पर तथा पुरानी बीमारियों मे रोग के इतिहास पर चिकित्सकों को बहुत अधीरता और सावधानी से विचार करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने पर ही रोग के मूल कारण का पता लग सकता है । वस्तुत: चिकित्सक को रोगी की शरीर रचना और प्रकृति – गठन , शक्ति , स्वभाव , आचरण , च्यवसाय , रहन सहन , आदतें , समाजिक तथा परिवारिक संबन्ध , आयु, ज्ञान्निद्र्यों के व्यवाहार पर पूरी तरह से विचार कर लेना चाहिये ।

    § 213

    We shall, therefore, never be able to cure conformably to nature – that is to say, homoeopathically – if we do not, in every case of disease, even in such as are acute, observe, along with the other symptoms, those relating to the changes in the state of the mind and disposition, and if we do not select, for the patient’s relief, from among the medicines a disease-force which, in addition to the similarity of its other symptoms to those of the disease, is also capable of producing a similar state of the disposition and mind.1

    1 Thus aconite will seldom or never effect a rapid or permanent cure in a patient of a quiet, calm, equable disposition; and just as little will nux vomica be serviceable where the disposition is mild and phlegmatic, pulsatilla where it is happy, gay and obstinate, or ignatia where it is imperturbable and disposed neither to be frightened nor vexed.

सूत्र २१३ – रोग के इलाज के लिये मानसिक दशा का ज्ञान अविवार्य

इस तरह , यह बात स्पष्ट है कि हम किसी भी रोग का प्राकृतिक ढंग से सफ़ल इलाज उस समय तक नही कर सकते जब तक कि हम प्रत्येक रोग , यहां तक नये रोगों मे भी  , अन्य लक्षणॊं कॆ अलावा रोगी के स्वभाव और मानसिक दशा मे होने वाले परिवर्तन पर पूरी नजर नही रखते । यादि हम रोगी को आराम पहुंचाने के लिये ऐसी दवा नही चुनते जो रोग के सभी लक्षण  के साथ उसकी मानसिक अवस्था या स्वभाव पैदा करनेच मे समर्थ है तो रोग को नष्ट करने मे सफ़ल नही हो सकते ।

सूत्र २१३ का नोट कहता है :

ऐसा रोगी जो धीर और शांत स्वभाव का है उसमे ऐकोनाईट और नक्स कामयाब नही हो सकती , इसी तरह एक खुशमिजाज नारी मे पल्साटिला या धैर्यवान नारी मे इग्नेशिया  का रोल नगणय ही  रहता है क्योंकि यह रोग और औषधि की स्वभाव से मेल नही खाते ।

pkt 2

Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें

Digg This

पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्दतियों और पशु होम्योपैथिक चिकित्सा के पहले डॆटाबेस का शुभारंभ (Launch of CAM Quest Database & Homeopathic Veterinary Database (VetCR))

Wednesday, 23 March 2011

जर्मनी में हाल ही में Carstens फाउंडेशन ने सीएएम में एक उत्कृष्ट क्लीकिल रिसर्च का ऑनलाइन डेटाबेस शुरू किया है. एक्यूपंक्चर, anthroposophic चिकित्सा, आयुर्वेद, bioenergetics, हर्बल चिकित्सा, होम्योपैथी, मैनुअल चिकित्सा, मन शरीर चिकित्सा और TCM: नौ विभिन्न उपचारोंको को इस अध्ययन मे शामिल किया गया है.
इस डेटाबेस मे जर्मनी  मे होम्योपैथिक केसों की रिपोर्ट की एक बड़ी संख्या शामिल है .वर्तमान में  यह डेटाबेस अंग्रेजी और फ्रेंच में उपलब्ध है,  लेकिन आगे  अन्य यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद करने की योजना है.  इस साइट पर जाने के लिये  http://www.cam-quest.org  पर किल्क करें .
पहला होम्योपैथिक पशु चिकित्सा डेटाबेस (VetCR)
पशु चिकित्सा होम्योपैथी के मामले में नैदानिक ​​अनुसंधान के पहले डेटाबेस अब ऑनलाइन उपलब्ध है. मूल पशु चिकित्सा के अध्ययन पर सभी उपलब्ध साहित्य , यादृच्छिक चिकित्सीय परीक्षण, गैर यादृच्छिक चिकित्सीय परीक्षण, पर्यवेक्षणीय अध्ययन, औषधि की प्रूविगं इस साईट पर सुलभता से उपलब्ध है . इस साईट पर जाने के लिये http://www.carstens-stiftung.de/clinresvet/index.php प्रर किल्क करें .

Launch of CAM-QuestDatabase
The Carstens Foundation in Germany has recently launched an excellent online database of clinica lresearch in CAM. Studies in nine different therapies have been included: acupuncture, anthroposophic medicine, ayurveda, bioenergetics, herbal medicine, homeopathy, manual medicine, mind-body medicine and TCM.
The database includes a large number of German homeopathic case reports and provides the facility to perform searches by disease, therapy and study design. The ‘quick search’ function provides a synopsis of studies using the most common therapies for the most common diseases whilst the ‘expert search’ function enables a detailed, comprehensive search across the CAM therapies and full range of diseases within the database.
At present the database is available in English, French, Dutch and German, but there are plans to translate it into all European languages. It is accessible free of charge at  http://www.cam-quest.org
First Homeopathic Veterinary Database (VetCR)
The first database of clinical research in veterinary homeopathy is now accessible online. Containing all available literature on original veterinary studies it provides access to approximately 200 entries of randomised clinical trials, non-randomised clinical trials, observational studies, drug provings, case reports and case series.
Produced by the Carstens Foundation, the database is freely available at [ http://www.carstens-stiftung.de/clinresvet/index.php

विश्व होम्योपैथी समुदाय ( Homeopathic World Community )

Friday, 29 May 2009

Photobucket

चन्द  हफ्तों के अन्दर ही  विश्व  होम्योपैथी समुदाय का नेटवर्क दुनिया भर के ५४ देशों से ७५० होम्योपैथिक चिकित्सकों , छात्रों और होम्योपैथिक चिकित्सा पद्दति के प्रति रुझान रखने वालों के बीच लोकप्रिय हो चुका है । कम्यूनिटी का मुख्य उद्देशय होम्योपैथिक चिकित्सकों के बीच समन्वय और  सकारात्मक अनुभवों का आदान प्रदान करना है ।

होम्योपैथिक वर्ल्ड कम्यूनिटी मे शामिल होने केलिये http://www.homeopathyworldcommunity.com पर चटका लगायें ।

साभार : डॆबी ब्रुक





In six short weeks Homeopathy World Community Network has over 750 members representing 54 Countries around the world. Members are physicians and professional health providers who have years of training. Some are students presently taking degree programs at universities, colleges and certificate seminars around the world. Other members joined the movement to learn more after experiencing positive effects from homeopathy

Click HERE to join Homeopathic World Community

Courtesy : Debby Bruck

Medicines regulator grants first ever licence to homeopathic remedy “Arnica”

Monday, 25 May 2009

image

Source : WDDTY & Times Online

Much to the anger of conventional medicine, the homeopathic remedy Arnica has been officially recognised as a successful remedy for treating sprains and bruises.

The Medicines and Healthcare Products Regulatory Agency (MHPRA) has registered the product, which means that the manufacturer can now make claims for its effectiveness. 

Arnica 30c, manufactured by Nelsons, is the first homeopathic remedy to be recognised without going through clinical trials.  Since 1971, homeopathic products have not been allowed to make any health claim without proper evidence.

But new rules, introduced in 2006, allow a manufacturer to make health claims for a product provided there is a tradition for its use in the UK, and it is for the treatment only of minor problems.

सनस्ट्रोक या लू लगना

Wednesday, 22 April 2009

गर्मी उफ़ान पर है , इस वर्ष लखनऊ का तापमान गत वर्षों के अपेक्षा अधिक ही दिख रहा है और पिछले कई दिनों मे आने वाले रोगियों मे भी तापाघात या heat stroke के केस अधिक ही दिखे । थोडी सी सावधानी , होम्योपैथिक औषधियों का सही लक्षणॊं पर चुनाव लू लगने के केसों को सरलता और सुगमता से निपटा सकते  हैं ।

लू लगना या heat stroke दोनो ही स्थितियाँ लगभग एक सी होती हैं । जहाँ सूर्य की तेज किरणॊं के सीधे गिरने से लू लग सकती है वहाँ कारखानों , भट्टी , होटल आदि मे काम करने वाने श्रर्मिकों को भी गरमी के कारण तापाघात हो सकता है ।

लेकिन पहले लक्षण :

१) रोगी का बैचेन और उदासीन दिखना । नियमित काम करने  मे अनिच्छा ।

२) नाडी की गति अधिक बढ जाने के फ़लस्वरुप रोगी का तापमान १०१-१०४ तक हो जाना ।

३) बार-२ प्यास लगना ।

४) अधिक तापमान के कारण बेहोश हो जाना ।

५) चेहरा लाल , सर दर्द , जी मिचलाना और उल्टियाँ होना ।

प्राथमिक उपचार :

१) रोगी के शरीर को ठंडा करें ,बर्फ़ की पट्टियाँ रखें और यदि रोगी होश मे है तो  तापमान कम करने के लिये तुरन्त नहलायें । कमरे मे पंखे , कूलर या ए.सी जो भी सुविधा हो उसे बन्द न करें ।

२) नाडी और तापमान हर आधे घंटॆ पर देखते रहें ।

३)यदि रोगी होश मे है तो निर्लजीकरण पर ध्यान रखें और ग्लूकोज और नमक या ओ.आर.एस. युक्त पानी लगातार देते रहें ।

४) कोई भी औषधि देने के पहले चिकित्सक की राय लें ।

५) लू से बचाव के लिये घर से निकलने समय खाली पेट न निकलें , ताजा खाना खायें , आम और पोदीना का पन्ना , दही का मट्ठा , नीबू की शिकजीं , प्याज का अधिक प्रयोग लू से बचाव करने मे कारगर है । बासी खाने , चाट , और जहाँ तक संभव हो गर्मी के दौरान माँसाहारी खाने से बचें ।

होम्योपैथिक उपचार :

ग्लोनाईन ( Glonine ) इस रोग की प्रधान दवा है ;  इससे आराम न मिलने पर बेलोडोना ( Belladona ) |  ३० पोटेन्सी मे दवा का चुनाव करें और १५-१५ मिनट के अन्तर पर प्रयोग करें । आराम मिलने पर दवा का अन्तर बढायें ।

camphor, opium, bellis pernis  भी अपने –२ विशिष्ट लक्षणॊं के अनुसार मुख्य दवाओं की श्रेणी मे आती है और एक कुशल होम्योपैथ की सलाह दवा प्रयोग करने के पहले अवशय लें । सनस्ट्रोक होने के बाद की हालत मे अगर रोग पुरना रुप धारण कर रहा है तब agaricus, anacardium और थोडी सी धूप मे सर दर्द बढने पर natrum mur, natrum carb और baryta carb की व्यवस्था करे ।

बेहोशी की हालत मे रोगी को औषध सेवन करने की क्षमता न रहने पर चुनी हुई औषधि को सफ़ कपडे या रुमाल मे रख कर सुघांये और बाद मे आरम मिलने पर दवा पीने को दें ।