Sunday, 26 April 2009

आज से २० वर्ष पूर्व होम्योपैथिक दवाओं का निर्माण कार्य आसान और कम खर्चीला था और इसी दौर मे कलकत्ता की अधिकाशं कम्पनियों  का सिक्का होम्योपैथिक दवा इन्डस्ट्री मे चलता रहा । सन्‌ १९९० के आस पास बदलाव की हवा चली , बाहरी कम्पनियों का आना एक के बाद एक शुरु हुआ , इसी दौर मे फ़्रान्स की बोरोन ( Boiron ) ने अपने देश से अनुबंध किया। हाल के दिनों मे  जर्मनी की विल्मर शवाबे ( इन्डिया ), बैकसन , रालसन , आर.एस. भारगव और बायो फ़ोर्स  ने भी दवा इन्डस्ट्री मे अपनी जगह बनायी । आज कलकत्ता की अधिकाशं होम्योपैथिक कम्पनियाँ उत्तर भारत मे तो कम से कम नजर नही आती । एक समय होम्योपैथिक को मजबूत और सस्ता आधार देने वाली कम्पनियों का सफ़ाया कम से कम कलकत्ता के अलावा शेष भारत मे तो हो ही चुका है । C.C.R.H. ( सेन्ट्र्ल काउन्सिल आफ़ होम्योपैथी ) और केन्द्र सरकार के नये नियमों के चलते अब होम्योपैथिक दवाओं पर मूल्य नियंत्रण आसान  नही रहा ।

होम्योपैथिक दवा इन्डस्ट्री मे नये बदलाव और गुणवत्ता  नियंत्रण क्या हैं इसको समझने के लिये यहाँ , यहाँ और यहाँ देखें । बोरोन इन्डिया की यूनिट पर एक नजर के लिये इस वीडियो को अवशय देखें :

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सनस्ट्रोक या लू लगना

Wednesday, 22 April 2009

गर्मी उफ़ान पर है , इस वर्ष लखनऊ का तापमान गत वर्षों के अपेक्षा अधिक ही दिख रहा है और पिछले कई दिनों मे आने वाले रोगियों मे भी तापाघात या heat stroke के केस अधिक ही दिखे । थोडी सी सावधानी , होम्योपैथिक औषधियों का सही लक्षणॊं पर चुनाव लू लगने के केसों को सरलता और सुगमता से निपटा सकते  हैं ।

लू लगना या heat stroke दोनो ही स्थितियाँ लगभग एक सी होती हैं । जहाँ सूर्य की तेज किरणॊं के सीधे गिरने से लू लग सकती है वहाँ कारखानों , भट्टी , होटल आदि मे काम करने वाने श्रर्मिकों को भी गरमी के कारण तापाघात हो सकता है ।

लेकिन पहले लक्षण :

१) रोगी का बैचेन और उदासीन दिखना । नियमित काम करने  मे अनिच्छा ।

२) नाडी की गति अधिक बढ जाने के फ़लस्वरुप रोगी का तापमान १०१-१०४ तक हो जाना ।

३) बार-२ प्यास लगना ।

४) अधिक तापमान के कारण बेहोश हो जाना ।

५) चेहरा लाल , सर दर्द , जी मिचलाना और उल्टियाँ होना ।

प्राथमिक उपचार :

१) रोगी के शरीर को ठंडा करें ,बर्फ़ की पट्टियाँ रखें और यदि रोगी होश मे है तो  तापमान कम करने के लिये तुरन्त नहलायें । कमरे मे पंखे , कूलर या ए.सी जो भी सुविधा हो उसे बन्द न करें ।

२) नाडी और तापमान हर आधे घंटॆ पर देखते रहें ।

३)यदि रोगी होश मे है तो निर्लजीकरण पर ध्यान रखें और ग्लूकोज और नमक या ओ.आर.एस. युक्त पानी लगातार देते रहें ।

४) कोई भी औषधि देने के पहले चिकित्सक की राय लें ।

५) लू से बचाव के लिये घर से निकलने समय खाली पेट न निकलें , ताजा खाना खायें , आम और पोदीना का पन्ना , दही का मट्ठा , नीबू की शिकजीं , प्याज का अधिक प्रयोग लू से बचाव करने मे कारगर है । बासी खाने , चाट , और जहाँ तक संभव हो गर्मी के दौरान माँसाहारी खाने से बचें ।

होम्योपैथिक उपचार :

ग्लोनाईन ( Glonine ) इस रोग की प्रधान दवा है ;  इससे आराम न मिलने पर बेलोडोना ( Belladona ) |  ३० पोटेन्सी मे दवा का चुनाव करें और १५-१५ मिनट के अन्तर पर प्रयोग करें । आराम मिलने पर दवा का अन्तर बढायें ।

camphor, opium, bellis pernis  भी अपने –२ विशिष्ट लक्षणॊं के अनुसार मुख्य दवाओं की श्रेणी मे आती है और एक कुशल होम्योपैथ की सलाह दवा प्रयोग करने के पहले अवशय लें । सनस्ट्रोक होने के बाद की हालत मे अगर रोग पुरना रुप धारण कर रहा है तब agaricus, anacardium और थोडी सी धूप मे सर दर्द बढने पर natrum mur, natrum carb और baryta carb की व्यवस्था करे ।

बेहोशी की हालत मे रोगी को औषध सेवन करने की क्षमता न रहने पर चुनी हुई औषधि को सफ़ कपडे या रुमाल मे रख कर सुघांये और बाद मे आरम मिलने पर दवा पीने को दें ।

Is homeopathy compatible with cancer therapy?

Monday, 20 April 2009

Source : CAM Report

This Cochrane review evaluated homeopathic medicines used to prevent or treat side effects of cancer treatments.

First, the details.

  • 8 studies in 664 participants were selected for review.
    • 3 studied adverse effects of radiotherapy
    • 3 studied adverse effects of chemotherapy
    • 2 studied menopausal symptoms associated with breast cancer treatment

And, the results.

  • 2 studies in 254 patients reported superiority of topical calendula (aka marigold) over trolamine (a topical non-steroidal drug) to prevent radiotherapy-induced dermatitis.
  • A study of 32 patients demonstrated superiority of Traumeel S over placebo as a mouthwash for chemotherapy-induced stomatitis (inflammation of the mouth).
    • Traumeel is a homeopathic anti-inflammatory and analgesic preparation containing 12 botanicals and 2 minerals.
  • 2 other studies reported positive results, although the risk of bias was unclear.
  • 4 studies reported negative results.

The bottom line?
Yes, there’s some supporting evidence for calendula and Traumeel S, concluded the authors. However, “there is no convincing evidence for the efficacy of homeopathic medicines for other adverse effects of cancer treatments.”

Regarding radiotherapy-induced dermatitis: Researchers from Princess Margaret Hospital, in Ontario, Canada conducted a review to evaluate prevention and management of acute skin reactions related to radiation therapy. They concluded, “Skin washing… should be permitted in patients receiving radiation therapy to prevent acute skin reaction.”

They also concluded, “There is insufficient evidence to support or refute specific topical or oral agents [including calendula] for the prevention or management of acute skin reaction.”

Regarding chemotherapy-induced stomatitis: NHS Trust has published an algorithm to guide management of stomatitis and mucositis for oncology patients receiving chemotherapy.

World Homeopathy Awareness Week

Saturday, 11 April 2009

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Courtesy : Health News

World Homeopathy Awareness Week (WHAW) is celebrated in over 45 countries around the world. The 2009 theme is “Homeopathy for Allergies.” Dates for the 2009 WHAW celebration is April 10-16, 2009. This year’s observations are also dedicated to the 254th anniversary of the birth of Samuel Hahnemann, the founder of homeopathy.
World Homeopathy Awareness Week is sponsored by World Homeopathy Awareness Organization (WHAO), a non-profit volunteer organization incorporated in the Netherlands in 2008. On February 28, 2009, WHAO was officially recognized as a non-profit in the Netherlands.

The first WHAW took place in 2005. The United States chapter, WHAW-US, won the WHOA’s award for outstanding contribution to homeopathic awareness in 2007. Other participating countries include Armenia, Belgium, Bulgaria, Croatia, Finland, Hungary, Israel, Kenya, Pakistan, Serbia, Spain, Ireland, Nepal, Australia, Bosnia, Denmark, Greece, India, Lithuania, New Zealand, Slovakia, Egypt, Bangladesh, Japan, Malaysia, Australia, Romania, South Africa, and Brazil.

For more information on World Homeopathy Awareness Week contact www.usahomeopathy.org or www.worldhomeopathy.org.

डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैमुअल हैनिमेन- जन्म दिवस पर विशेष ( A Tribute to Dr Samuel Hahnemann )

Friday, 10 April 2009

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इतिहास के चन्द पन्नों को समटेने की कोशिश करते हुये आँखे नम सी हो जाती हैं । मेरे सामने ब्रैडफ़ोर्ड की " लाइफ़ एन्ड लेटर आफ़ हैनिमैन " और हैल की " लाइफ़ एन्ड वर्कस आफ़ हैनिमैन " के उडते हुये पन्ने मानों वक्त को एक बार फ़िर समेट सा  रहे हैं । यह पुस्तकें मैने शौकिया अपने कालेज के दिनों मे ली थी लेकिन कभी भी पढने की फ़ुर्सत न मिली  । पिछ्ले साल जब hpathy.com के डा. मनीष भाटिया की भावपूर्ण जर्मनी  यात्रा को पढने का अवसर मिला तब इस लेख को लिखने की सोची थी लेकिन फ़िर आलसवश टल गया । १० अप्रेल हैनिमैन की जन्म तिथि के रुप मे जाना जाता है । मुझे नही लगता कि किसी भी अन्य पद्दति मे चिकित्सक अपने सिस्टम के संस्थापकों से इतना नही जुडॆ  हैं जितना कि एक होम्योपैथ । बहुत से कारण हैं लेकिन सबसे बडा कारण है होम्योपैथी का विषम परिस्थियों मे उद्‌भव । हैनिमैन अपनी जिंदगी मे वह सब कुछ बहुत आसानी से पा सकते थे अगर वह वक्त के साथ समझौता कर लेते लेकिन उन्होने नही किया । सही कहा है , "कीर्तियस्य स जीवति “ – आज कौन कह सकता है कि हैनिमैन इस जगत मे नही हैं ।

  डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैमुअल हैनिमेन  का जन्म सन्‌ १७५५ ई. की १० अप्रेल को जर्मनी मे सेक्सनी प्रदेश के  माइसेन नामक छॊटे से गाँव मे हुआ था  । एक बेहद गरीब परिवार मे जन्मे हैनिमैन का बचपन अभावों और गरीबी  मे बीता । आपके पिता एक पोर्सीलीन पेन्टर थे ,  सीमित संस्धानों  को देखते हुये  हुये वह चाहते थे कि उनका पुत्र भी इस व्यवसायाय मे रुचि दिखाये । लेकिन अनेक प्रतिभाओं के धनी हैनिमैन को यह मन्जूर नही था । अनेक भाषाओं के ज्ञाता हैनिमैन ने जीवन संघर्ष की शुरुआत  रसायन और अन्य  ग्रन्थों के अंग्रेजी भाषा से जर्मन मे अनुवाद से प्रारम्म्भ  की । सन्‌ १७७५ मे हैनिमैन लिपिजिक मेडिकल की पढाई के लिये निकल पडे , लिपेजेक मेडिकल कालेज मे हैनिमैन को उनके प्रोफ़ेसर डा. बर्ग्रैथ का भरपूर साथ मिला जिसके कारण उनकी पढाई के कई साल पैसों की तंगी के बिना भी चलते रहे ।

   हैनिमैन की जिदंगी का महत्वपूर्ण हिस्सा खानाबदोशों की जिदंगी की तरह से बीता । वियाना से हरमैन्स्ट्डट ( जो अब शीबू , रोमेनिया के नाम से जाना जाता है ) जहाँ डा. क्युंरीन ने हैनिमैन को मेडिकल की पढाई के बाद नौकरी  दिलाने मे मदद की । सन्‌ १७७९  मे   हैनिमैन ने मेडिकल की पढाई पूरी की और जर्मनी के कई छॊटे गाँवों मे प्रैक्टिस करनी आरम्भ की लेकिन पाँच साल की प्रैकिटस के बाद उन्होने उस समय के प्रचलित तरीकों से तंग आकर प्रैक्टिस छोड दी । उस समय की मेडिकल चिकित्सा पद्दति आज की तरह उन्नत  न थी । इसी दौरान १७८२ मे हैनिमैन का विवाह जोहाना लियोपोल्डाइन से हुआ जिससे बाद मे उनसे ११संताने हुयीं। सन्‌ १७८५ से १७८९ तक हैनिमैन की जीवका का मुख्य साधन अंग्रेजी से    जर्मनी मे अनुवाद और रसायन शास्त्र मे शोधकार्यों से रहा । इसी दौरान हैनीमैन ने आर्सेनिक पाइसिन्ग पर शोध पत्र  जारी किया  । सन्‌ १७८९ मे हैनिमैन एक बार फ़िर सपरिवार लिपिजिक की तरफ़ चल दिये । "मरकरी का  सिफ़लिस मे कार्य" हैनिमैन ने सालयूबल मरकरी के रोल को अपने नये शोध पत्र मे वर्णित किया ।

सन्‌ १७९१ , ४६ वर्षीय हैनिमैन के लिये महत्वपूर्ण रहा । उनके नये विचारों को नयॊ दिशा देने मे कलेन की मैटिया मेडिका का अनुवाद रहा । एक बार जब  डाक्‍टर कलेन की लिखी “कलेन्‍स मेटेरिया मेडिका” मे वर्णित कुनैन नाम की जडी के बारे मे अंगरेजी भाषा का अनुवाद जर्मन भाषा में कर रहे थे तब डा0 हैनिमेन का ध्‍यान डा0 कलेन के उस वर्णन की ओर गया, जहां कुनैन के बारे में कहा गया कि ‘’ यद्यपि कुनैन मलेरिया रोग को आरोग्य करती है, लेकिन यह स्वस्थ शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा करती है।
हैनिमैन ने कलेन की यह बात पर तर्कपूर्वक विचार करके कुनैन जड़ी की थोड़ी थोड़ी मात्रा रोज खानीं शुरू कर दी। लगभग दो हफ्ते बाद इनके शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा हुये। जड़ी खाना बन्द कर देनें के बाद मलेरिया रोग अपनें आप आरोग्य हो गया। इस प्रयोग को  हैनिमेन ने कई बार दोहराया और हर बार उनके शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा हुये। क्विनीन जड़ी के इस प्रकार से किये गये प्रयोग का जिक्र डा0 हैनिमेन नें अपनें एक चिकित्‍सक मित्र से किया। इस मित्र चिकित्सक  नें भी  हैनिमेन के बताये अनुसार जड़ी का सेवन किया और उसे भी मलेरिया बुखार जैसे लक्षण पैदा हो गये।
हैनिमैन ने अपने प्रयोगों  को जारी रखा तथा  प्रत्येक जडी, खनिज , पशु उत्पादन, रासायनिक मिश्रण आदि का स्वयं पर प्रयोग किया। उन्होने  पाया कि दो तत्व समान लक्षण प्रदान नही करते हैं। प्रत्येक तत्व के अपने विशिष्ट लक्षण होते हैं। इसके अतिरिक्त लक्षणों को भौतिक अवस्था में परिष्कृत नही किया जा सकता है। प्रत्येक परीक्षित तत्व ने मस्तिष्क तथा शरीर की संवेदना को भी प्रभावित किया। उन्हे उस समय की चिकित्सा पद्घति ने विस्मित कर दिया तथा उन्होने रोग उपचार की एक पद्धति को विकसित किया जो सुरक्षित, सरल एवं प्रभावी थी। उनका विश्वास था कि मानव में रोगों से लडने की स्वतः क्षमता होती है तथा रोग मुक्त होने के लिए मानव के स्वयं के संघर्ष रोग लक्षणों को प्रतिबिम्बित करते हैं।

कुछ समय बाद उन्‍होंनें शरीर और मन में औषधियों द्वारा उत्‍पन्‍न किये गये लक्षणों, अनुभवो और प्रभावों को लिपिबद्ध करना शुरू किया। हैनिमेन की अति सूक्ष्म दृष्टि और ज्ञानेन्द्रियों नें यह निष्कर्ष निकाला कि और अधिक औषधियो को इसी तरह परीक्षण करके परखा जाय। हैनिमैन अब तक पहले की भाँति एलोपैथिक अर्थात स्थूल मात्रा मे ही दवाओं का प्रयोग करते थे । लेकिन उन्होने देखा कि रोग आरोग्य होने पर भी कुछ दिन बाद नये लक्षण उत्पन्न होते हैं । जैसे क्विनीन का सेवन करने पर ज्वर तो ठीक हो जाता है पर उसके बाद रोगी को रक्तहीनता , प्लीहा , यकृत , शोध , इत्यादि अनेक उपसर्ग प्रकट होकर रोगी को जर्जर बना डालते हैं । हैनिमैन ने दवा की मात्रा को घटाने का काम आरम्भ किया । इससे उन्होने निष्कर्ष निकाला कि दवा की परिमाण या मात्रा भले ही कम हो , आरोग्यदायिनी शक्ति पहले की तरह शरीर मे मौजूद रहती है और दवा के दुष्परिणाम भी पैदा नही  होते ।
इस प्रकार से किये गये परीक्षणों और अपने अनुभवों को डा0 हैनिमेन नें तत्कालीन मेडिकल पत्रिकाओं में ‘’ मेडिसिन आंफ एक्‍सपीरियन्‍सेस ’’ शीर्षक से लेख लिखकर प्रकाशित कराया । इसे होम्योपैथी के अवतरण का प्रारम्भिक स्वरुप कहा जा सकता है। होम्योपैथी शब्द यूनानी के दो शब्दों (Homois ) यानि सदृश (Similar ) और पैथोज ( pathos ) अर्थात रोग (suffering) से बना है । होम्योपैथी का अर्थ है सदृश रोग चिकित्सा । सदृश रोग चिकित्सा का सरल अर्थ है कि जो रोग लक्षण जिस औषध के सेवन से उत्पन्न होते हैं , उन्हीं लक्षणॊं की रोग मे सदृशता होने पर औषध द्वारा नष्ट किये जा सकते हैं । यह प्रकृति के सिद्दांत " सम: समम शमयति " यानि similia similbus curentur पर आधारित है । लेकिन हैनिमैन के शोध को तगडे विरोध का सामना करना पडा और हैनिमैन पर उनकॆ दवा बनाने के तरीको पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई ।

लेकिन सन्‌ १८०० मे हैनिमैन को अपने नये तरीको से सफ़लता मिलनी शुरु हुयी जब स्कारलैट फ़ीवर नाम के महामारी मे बेलोडोना का सफ़ल रोल पाया गया । एक बार फ़िर हैनिमैन अपने समकक्ष चिकित्सकों के तगडे विरोध का कारण बने ।

सन्‌  १८१० हैनिमैन ने आर्गेनान आफ़ मेडिसन का पहला संस्करण निकाला जो होम्योपैथी फ़िलोसफ़ी का महत्वपूर्ण स्तंभ था । १८१४ तक जाते-२ हैनिमैन ने अपने , अपने परिवार और कई मित्र चिकित्सकॊ जिनमे गौस , स्टैफ़, हर्ट्मैन और रुकर्ट प्रमुख थे ,  के ग्रुप पर दवाओं कॊ परीक्षण करना प्रारम्भ किया । इस समूह को हैनिमैन ने प्रूवर यूनियन का नाम दिया ।

सन्‌ १८१३ मे हैनिमैन को एक बार फ़िर सफ़लता हाथ लगी । जब नेपोलियन की सेना के जवानों के बीच टाइफ़स महामारी बन के उभरी । बहुत जल्द ही यह माहामारी जरमनी  मे भी आ गई , इस बार हैनिमैन को ब्रायोनिया और रस टाक्स से  सफ़लता हाथ लगी । सन्‌ १८२० मे  लिपिजक शहर की काउनसिल से हैनिमैन के कार्यों पर पूरी तरह से रोक लगा दी और सन १८२१ मे हैनिमैन को शहर से बाहर जाने का रास्ता दिखाया । हैनिमैन कोथन की तरफ़ चल दिये , यहाँ  के ड्यूक फ़रडनीनैन्ड जो हैनिमैन की दवा से लाभान्वित हो चुके थे , कोथन मे नये तरीको से प्रैकिटस और दवाओं को बनाने की इजाजत दी । कोथन मे हैनिमैन लगभग १२ साल तक रहे और यहाँ से होम्योपैथी को नया आधार मिला ।

इसी दौरान कोथन मे हैनिमैन  जटिल रोगों और मियाज्म पर किये कार्यों को सामने ले कर आये  । सन १८२८ मे हैनिमैन ने chronic diseases पर पहला संस्करण निकाला । हैनिमैन की विचारधारा के एक तरफ़ तो सहयोगी भी थे जिनमे बोनिगहसन , स्टाफ़ , हेरिग और गौस थे उधर दूसरी तरफ़ कुछ साथी चिकित्सक जिनमे डा. ट्रिन्क्स ने असहोयग का रास्ता अपनाते हुये उनके नये कार्यों को समय से प्रकाशन होने मे अडंगे लगाये ।

सन्‌ १८३१ मे होम्योपैथी को एक बार फ़िर से सफ़लता हाथ लगी , इस बार रुस के पशिचमी भाग से महामारी के रुप मे फ़ैलता  हुआ कालरा मे होम्योपैथिक औषधियों जिनमे कैम्फ़र , क्यूपरम और वेरटर्म ने न जाने कितने रोगियों की जान बचायी

  कोथन मे हैनिमैन को डा. गोटफ़्रेट लेहमन का अभूतपूर्व सहयोग मिला ,। लेकिन लिपिजिक मे हैनिमैन नकली होम्योपैथों के रुप मे बढती भीड से काफ़ी खफ़ा हुये । सन्‌ १८३३ मे लिपिजिक मे पहला होम्योपैथिक अस्पताल डा. मोरिज मुलर के तत्वधान मे खुला ; सन्‌ १८३४ तक हैनिमैन बडे चाव से इस अस्पताल मे अपना सहयोग देते रहे । लेकिन सन्‌ १८३५ मे हैनिमैन के पैरिस के लिये रवाना होते ही जल्द ही अस्पताल पैसे की तंगी के कारण  १८४२ मे बन्द करना पडा ।

हैनिमैन  की जीवन के आखिरी क्षण कुछ रोमांन्टिक नावेल से कम नही थे । सन्‌ १८३४ मे ३२ वर्षीय  खूबसूरत मैरी मिलानी ८० साल के  हैनिमैन की जिंदगी मे आयी और  मात्र तीन महीने की मुलाकात के बाद उनकी जिंदगी के हमसफ़र हो गयी । मिलानी का रोल हैनिमैन की जिदगी मे बहुत ही विवादस्तमक रहा । उनका मूल  उद्देशय हैनिमैन के नयी चिकित्सा पद्दति मे था । इसके बाद की घटनाये इस बात का पुख्ता सबूत थी कि मिलानी किस उद्देशय से आयी थी ।

लेकिन यह भी सच था कि कई साल के संघर्ष, गरीबी और मुफ़लसफ़ी के बाद हैनिमैन ने अपनी खूबसूरत पत्नी के साथ फ़्रान्स की उच्च सोसयटिइयों मे जगह बनाई । जीवन के आखिरी सालों  मे मिलानी ने हैनिमैन को उनके पहली पत्नी से हुये  संतानों से दूर कर दिया और पैरिस मे हैनिमैन को अपने नये प्रयोगों को जारी रखने को कहा । फ़्रान्स मे हैनिमैन ने LM पोटेन्सी पर किये कार्यों को आखिरी जामा पहनाया । फ़्रान्स मे होम्योपैथी की शोहरत जर्मनी से अधिक फ़ैली , यहाँ‘ एक तो अंडगॆ कम थे और बाकी एलोपैथिक चिकित्सकॊ मे भी  नयी चिकित्सा पद्द्ति को अजमाने मे दिलचस्पी भी थी । आर्गेनान का छटा संस्करण फ़्रान्स मे ही हैनिमैन ने लिखा लेकिन मिलानी के रहते सन्‌ १८४३ मे हैनिमैन की मृत्यु के बाद भी उसका प्रकाशन न हो पाया । ८८ वर्षीय हैनिमैन सन्‌ १८४३ मे मृत्यु को प्राप्त हुये । लेकिन जाते-२ वह होम्योपैथिक जगत को आर्गेनान का छटा  बेशकीमती संस्करण देते गये । मिलानी के चलते यह महत्वपूर्ण संस्करण जिसमे हैनिमैन ने LM पोटेन्सी की जोरदार वकालत की , प्रकाशित न हो पाया । मिलानी इसके बदले मे प्रकाशक से मॊटी रकम चहती थी जिसका मोल भाव हैनिमैन के रहते न हो पाया । हैनिमैन की मृत्यु के कई साल के बाद सन्‌ १९२० मे इस संस्करण को विलियम बोरिक और सहयोगियों की मदद से प्रकाशित किया गया । लेकिन तब तक पूरे विश्व मे होम्योपैथिक चिकित्सकों के मध्य आर्गेनान का पाँचवा संस्करण लोकप्रिय हो चुका था और आज भी हम छटे संस्करण की और विशेष कर LM पोटेन्सी के लाभों से अन्जान ही रह गये ।

मिलानी का विवादों से भरा रोल हैनिमैन को दफ़नाने मे भी रहा । एक अनाम सी जगह मे हैनिमैन को उन्होने गोपनीय ढंग से दफ़नाया  । बाद मे विरोध के चलते हैनिमैन के पार्थिव शरीर को एक दूसरी कब्र मे दफ़नाया गया जिसके ऊपर वर्णित किया गया , " Non inutilis vixi , " I have not lived in a vain " " मेरी जिंदगी व्यर्थ  नही गयी "

रसायन और मेडेसिन  मे ७० से ऊपर मौलिक कार्य, लगभग दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का अंग्रेजी , फ़्रेन्च, लैटिन और ईटालियन से जर्मन भाषा मे अनुवाद , अपने दम और तमाम विरोधों के बीच पूरी पद्दति का बोझा उठाये हैनिमैन को कम कर के आँकना उनके साथ नाइन्साफ़ी होगी । और सब से से मुख्य बात वह मृदुभाषी थे , अपने मित्र स्टैफ़ को लिखे पत्र मे वह लिखते हैं , " Be as sparing as possible with your praises . I do not like them . I feel that I am only an honest , straightforward man who does no more than his duty . "

रात बहुत हो चुकी है , मुझे लगता है अब सो जाना चाहिये , कल फ़िर १० अप्रेल होगी , एक बार फ़िर हम किसी न किसी होम्योपैथिक कालेज के प्रांगण मे हैनिमैन को याद कर रहे होगें लेकिन होम्योपैथिक की शिक्षा प्रदान देने वाले संस्थान अपने आप से पूछ के देखें कि इतने सालों मे हम एक दूसरा हैनिमैन क्यूं नही बना पाये ? हमे इन्तजार है उस पल का , एक नये अवतरित होते हैनिमैन का और आर्गेनान के साँतवें संस्करण का भी .......
अलविदा ...
शुभरात्रि ।

यह भी देखें :