हकीकत बयान करते यह हाथ के नाखून

Tuesday, 13 February 2007

gabrielletraub.jpg nailsकैलीफ़ोर्निया की डा गैब्रैली ट्रायूब (Dr. Gabrielle Traub) द्वारा रचित यह लेख जनवरी 2007 की Homeopathy 4 Everyone मे प्रकाशित हुआ था। यह लेख और उसका संकलन वैसे तो एक आम चिकित्सक के किये कोई विशेष नहीं था लेकिन इसकी विशेषता एक होम्योपैथिक चिकित्सक के लिये नाखून की बनावट और रंग के आधार पर औषधि के चयन मे अवशय है। इस लेख को यहाँ देख सकते हैं और इसका Power Point Presentation यहाँ से डाउनलोड कर सकते है ।
[slideshare id=105892&doc=fingernails-and-what-they-reveal-1170&w=425]

होम्पैथ क्लासिक 8 -समस्या का सुखद अंत

Friday, 2 February 2007

HP


P.M.S मे आ रही तारीखों से संबधित समस्यायें अब पूरी तरह से दूर हो चुकी हैं। डा शाह आपका-2 बहुत धन्यवाद । इस समस्या को दूर करने के लिये अपग्रेड यहाँ पर हैं , जिन होम्पैथ प्रयोगकर्ताओं को इस समस्या से जूझना पडा है वह अपग्रेड के लिये सीधे डां जवाहर शाह जी से सम्पर्क करें।

होम्पैथ क्लासिक 8 साफ़्ट्वेएर- मुसीबतों का अन्त नहीं

Monday, 29 January 2007


 
लगता है कि डा जवाहर शाह और मेरे मध्य छतीस का आंकडा बन चुका है। पिछला पंगा बडी मुशिकल से समाप्त हो ही पाया था और अब यह नया पंगा शुरु हो गया। अब की समस्या इस साफ़्ट्वेएर के PMS यानि patient management system को लेकर है। कई खूबियों के होते हुये भी मै इस साफ़्ट्वेएर के निर्माताओ की कार्य प्रणाली से बिल्कुल भी सन्तुष्ट नही हूँ। मेल पर मेल भेजे जाओ पर जबाब देना उचित नही समझते, Hpathy.com और otherhealth.com पर शिकायतों के पुलिन्दे इकट्ठा हो चुके हैं । लेकिन साफ़्ट्वेएर निर्माता इस बात को नही समझते कि उनके द्वारा प्रदान की गयी सर्विस उनके उत्पाद को कसौटी पर परखने मे सिद्द होते हैं।
समस्या है क्या ?


नीचे दिये गये चित्र इस समस्या को ठीक से समझा सकते हैं।
classic 8
cl
ऊपर आकृति को गौर से देखें:



  • 26-1-2007 को रोगी दिखाने के लिये आया। देखें करसर नं-1


  • पिछली बार रोगी 15-1-2007 को आया था। देखें करसर नं-2


  • चूँकि रोगी को पिछली औषधि से आराम था, इसलिये यह औषधि को दोबारा repeat करना था।


  • इसलिये copy presc को किल्क किया गया। देखें करसर नं-3


  • लेकिन यह क्या, यह तो 15-5-2006 की औषधि को repeat कर रहा है, जब कि मुझे 25-12-2006 की औषधि को देना था।


  • यह क्यों हुआ? इसका कारण साफ़्ट्वेएर तारीखों को गलत ले रहा है। इसको 19-1-2007 की पूर्व तिथि 15-1-2007 को दिखाना चाहिये था, जबकि यह 1-7-2006 को दिखा रहा है।

शुरू -2 तो मुझे लगा यह परेशानी कम्पयूटर मे शायद वाइरस की वजह से हो, वाइरस स्कैन किया , कुछ नही निकला। परसों सोचा कि और चिकित्सकों से भी सम्पर्क किया जाय जो इस साफ़्ट्वेएर को प्रयोग कर रहे हैं और कमोबक्श सब चिकित्सकों की तकलीफ़ PMS को लेकर ही निकली। कल लखनऊ से ही डा पियूष पान्डे जी ने भी इसी समस्या की ओर अपना नजरिया स्पष्ट किया ।
इसी समस्या को लेकर मैने होम्पैथ के ऊतर पदेश वितरक डा पुष्कर से बात की , हर बार की तरह उनका रविया टालू रहा, आने का आशवासन देकर उन्होने तो मेरे कम्पयूटर की यादशात को ही गडबड ठहरा दिया। ( low memory। इस ब्लाग पर इस समस्या को लाने का मेरा कोई इरादा नही था लेकिन अब मुझे लगने लगा है कि पानी सर से ऊपर गुजर चुका है, एक दो दिन मे फ़िर Hpathy forum और otherhealth के forum मे दोबारा जाने का इरादा बना लिया है।
जवाहर शाह जी, समस्यायें तो सब के साथ आती रहती हैं लेकिन उनका समाधान तो दीजिये, आज 15000 रू लगाने के बाद दूसरे साफ़्टवेएर मे जाने की हिम्मत नही। हाँ, रडार(Radar) दूसरा और अच्छा विकल्प है, कम से कम रडार समय -2 पर लगातार अपडेटस दे कर बग्स (bugs)और दूसरी समस्याओ को दूर तो करता रहता है लेकिन उसको लेने के लिये भी कम से कम 25000/- का चूना तो लगेगा ही। आप देगें क्या?

भागते युग की मशीनी समस्या- सरवाईकल स्पान्डयलोसिस(Cervical Spondylosis)

Tuesday, 16 January 2007


इधर के कुछ सालों मे अगर हम गौर करें तो सरवाईकल स्पान्डयलोसिस के रोगियों मे बेतहाशा वृद्दि हुयी है। ओ पी डी मे आने वाले रोगियों मे जहाँ इक्का-दुक्का ही रोगी इस रोग के नजर आते थे वहीं अब काफ़ी बडी संख्या इसकी नजर आती है। आयु, वर्ग विशेष से भी अब इसका लेना-देना न रहा। 15 वर्ष की आयु से बढती हुयी उभ्र के लोगों मे यह समस्या आम देखी जा सकती है। इस लेख मे मेरुदंड की संरचना ,इस मशीनी समस्या के कारण, लक्षण और महत्वूर्ण जाँचे, , फ़िजयोथिरेपी और एकयूप्रेशर की उपयोगिता और होम्योपैथिक औषधियों की भूमिका पर एक नजर देखेगें। जहाँ यह लेख आम होम्योपैथिक चिकित्सक की याददाश्त को रिफ़्रेश करेगा वहीं आम लोगों को भी इस समस्या और इससे उत्पन्न होने वाले लक्षणों से बचने के बारे मे भी उपयोगी जानकारी देगा। ( हाँ , एक आवशयक सलाह : आम जन के लिये : इस लेख मे दी गयी फ़िजयोथिरेपी और एकयूप्रेशर की व्यायामों और होम्योपैथिक औषधियों को आजमाने की चेष्टा न करें, आपका चिकित्सक और फ़िजयोथिरेपिस्ट ही आपको सर्वश्रेष्ठ सलाह दे सकता है। )मेरुदण्ड की संरचना:


cev 1

आकृति नं0 1यह एक सम्पूर्ण मेरुदंड की संरचना है , ऊपर दिये चित्र से स्पष्ट है कि मेरुदण्ड के पाँच हिस्से हैं-

    1-सर्वाईकल (Cervical)
    2-थोरॅसिक (Thoracic)
    3-लम्बर (Lumbar)
    4-सैकरम (Sacrum)
    5-कौसिक्स (coccyx)
    सर्वाईकल स्पाईन मेरुदण्ड की पाँच वर्टीबरी से मिल कर बनी होती है। C1-C7 जहाँ C सरवईकल का सूचक है। C1 सिर के पृष्ठ भाग के और C7 स्पाइन के थोरेसिक हिस्से से सटी रहती है।
    लक्षण और कारणरोग के लक्षण कोई आवशयक नहीं कि सिर्फ़ गर्दन की दर्द और जकडन को ही लेकर आयें। विभिन्न रोगियों मे अलग -2 तरह के लक्षण देखे जाते हैं:
  • गर्दन की दर्द और जकडन, गर्दन स्थिर रहना, बहुत कम या न घूमना।
  • चक्कर आना ।
  • कन्धे का दर्द, कन्धे की जकडन और बाँह की नस का दर्द ।
  •  ऊगलियों और हथेलियों का सुन्नपन 
  •  गर्दन की दर्द के प्रमुख कारण:
      वजह अनेक लेकिन सार एक, अनियमित और अनियंत्रित लाइफ़ स्टाईल। वजह आप स्वंय खोजें:
  • टेढे-मेढे होकर सोना, हमेशा लचक्दार बिछौनों पर सोना, आरामदेह सोफ़ों तथा गद्देदार कुर्सी पर घटो बैठे रहना, सोते समय ऊँचा सिरहाना (तकिया) रखना, लेट कर टी वी देखना ।
  • गलत ढंग से वाहन चलाना
  • बहुत झुक कर बैठ कर पढना, लेटकर पढना ।
  • घटों भर सिलाई, बुनाई, व कशीदा करने वाले लोगों।
  • गलत ढंग से और शारीरिक शक्ति से अधिक बोझ उठाना
  • व्यायाम न करना और चिंताग्रस्त जीवन जीना।
  • संतुलित भोजन न लेना, भोजन मे विटामिन डी की कमी रहना, अधिक मात्रा मे चीनी और मीठाईयाँ खाना।
  • गठिया से पीडित रोगी
  • घंटों कम्पयूटर के सामने बैठना और ब्लागिगं करना )
    महत्वपूर्ण जाँचे:
  • X-rays
  • Computed Tomography
  • Magnetic Resonance Imaging
  • Myelogram/CT
  • Discography
    अधिकतर रोगियों मे X-rays ही हकीकत बयान कर देते हैं। सरवाईकल डिस्क मे आने वाली आम समस्यायें नीचे दिये चित्र से स्पष्ट हो जाती हैं। इनमें अधिकतर रोगियों मे interverteberal disc spaces का कम हो जाना और osteophyte का बनना मुख्य है। देखें नीचे आकृति नं0 2
    CERV2CERV4
    CERV3
    रोग निवारण के लिये प्रचलित उपचार तरीके:


    मुसीबत मोल लेने से परहेज बेहतर:

    मुसीबत न आये इसलिये यह आवशयक है कि उन मुसीबतों को बुलावा न दिया जाय । पीठ की दर्द के लिये भी यही सावधानियाँ काम आयेगीं। इसलिये निम्म बातों का ध्यान रखें और जीवन सुचारु रुप से जियें:
  • Correct way of sitting जब भी कुर्सी या सोफ़े पर बैठें तो पीठ को सीधी रखें तथा घुटने नितम्बों से ऊँचे होने चाहिये।
  • चलते समय शरीर सीधी अवस्था मे होना चाहिये।
  • गाडी चलाते समय अपनी पीठ को सीधी रखें।
  • कोमल, फ़ोम के गद्दो पर लेटना छोडकर तख्त का प्रयोग करें ।
  • घर का काम करते समय पीठ को सीधी रखें।
  • गर्दन की सिकाई
    1-Cervical diathermy

    2-Ultrasound radiations

    3-Hot fomentatations

    तीव्र दर्द के हालात मे गर्म पानी मे नमक डाल कर सिकाई करें। यह क्रम दिन मे कम 3-4 बार अवश्य करें। दर्द को जल्द आराम देने मे यह काफ़ी लाभदायक है।
    तकिये (pillow) की बनावटसिरहाने को लेकर लोगों मे अलग- 2 तरह की भ्रान्तियॉ हैं। सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस से पीडित व्यक्ति या तो तकिया लगाना ही बन्द कर देता है या फ़िर अन्य सहारे का प्रयोग करने लगता है जैसे तौलिये को मोड कर सिर के नीचे रखना। लेकिन यह सब प्रयोग अन्तः उसके लिये नुकसान ही पैदा करते हैं। नीचे दी गयी आकृति न 3 के अनुसार तकिया बनवायें जो बाजार मे बिक रहे सिरहाने की तुलना मे सुविधाजनक रहता है।pillow
    Cervical Collar ( सरवाइकल कौलर) और Cervical Traction ( सरवाइकल ट्रेक्शन )सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस के हर रोगी मे कौलर और ट्रेक्शन की आवशयकता नही पडती , लेकिन आजकल इसका प्रयोग कई जगह बेवजह भी होता रहता है। लेकिन रोगी के रोग की वजह के अनुसार इसका महत्व भी है।
    जाडे आते ही सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस के रोगियों की समस्यायें बढनी शुरु हो जाती हैं, बाजार मे मिलने वाले कालर के अपेक्षा आम प्रयोग होने वाले मफ़लर को गले मे circular way मे इस तरह बाधें कि गर्दन का घुमाव नीचे की तरफ़ अधिक न हो। देखने मे भी यह अट-पटा नहीं लगता और गर्दन की माँसपेशियों को ठंडक से भी बचाव अच्छी तरह से कर लेता है।
    एकयूप्रेशर (Acupressure)बहुत से चिकित्सक संभवत: एकयूप्रेशर की उपयोगिता से सहमत नहीं रहते हैं, लेकिन सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस के कई रोगियों मे मैने इस पद्दति को बखूबी आजमाया है , भले ही यह कारणों को दूर करने मे सक्षम न हो लेकिन दर्द की तीव्रता को यह काफ़ी जल्द आराम दे देती है। सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस मे प्रयुक्त होने वाले व्यायामों के चित्र यहाँ दिये हैं, जिन एक्यूप्रेशर व्यायामों को मै अक्सर प्रयोग कराता हूँ उनके चित्र नीचे दिये हैं।
    acu 5ACU6
    ACU7ACU8
    सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस मे फ़िजयोथिरेपी की भूमिका:सरवाईकल व्यायाम दर्द की तीव्रता को घटाते हैं ही साथ मे अकडे हुये जोडों और माँसपेशियों को भी सही करते हैं ।
    मूलत: दो प्रकार के व्यायामों पर सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस मे जोर रहता है:
    1-Range of motion exercises

    2-Isometric exercises

    Range of motion exercises
    नीचे दी हुयी आकृति motion exercises को स्पष्ट कर रही है:
    Range of motion exercises

  • अपने सिर को दायें तरफ़ कन्धे तक झुकायें , थोडा रूकें और तत्पश्चात मध्य मे लायें। यही क्रम बायें तरफ़ भी करें।


  • अपनी ठुड्डी ( chin) को सीने की तरफ़ झुकायें, रुकें,तत्पश्चात सिर को पीछे ले जायें।
  • अपने सिर को बायें तरफ़ के कान की तरफ़ मोडें, रुकें और तत्पश्चात मध्य मे लायें। यही क्रम बायें तरफ़ भी करें।

    Isometric exercises

Isometric exercises को करते समय साँस को रोके नहीं। हर व्यायाम को 5-6 बार तक करें और इसके बाद शरीर को ढीला छोड दें।

  • अपने माथे को हथेलियों पर दबाब दे और सर को अपनी जगह से हिलने न दें।
  • अपनी हथेलियों का दबाब सिर के बायें तरफ़ दे और सिर को हिलने न दें। यही क्रम दायें तरफ़ भी करें।
  • अपनी दोनों हथेलियों का दबाब सिर के पीछे दें और सिर को स्थिर रखें।
  • अपनी हथेलियों का दबाब माथे पर दें और सिर को स्थिर रखें।

फ़िजयोथिरेपी व्यायामों को करते समय यह बात हमेशा ध्यान रखें कि अगर किसी भी समय ऐसा लगे कि दर्द का वेग बढ रहा है तो व्यायाम कदापि न करें। “दर्द नहीं तो व्यायाम करने से क्या लाभ” का फ़न्डा न अपनायें। सरवाईकल व्यायामों को कम से कम दिन मे दो बार अवशय करें ।2-साभार श्री रवि रतलामी :
Noname
एक सपाट बिस्तर या फ़र्श पर बिना तकिये के पीठ के बल लेट जाएँ. फिर अपनी गर्दन को जितना संभव हो सके उतना धीरे धीरे ऊपर उठाते जाएँ. ध्यान रहे, पीठ का हिस्सा न उठे. गहरी से गहरी सांस भीतर खींचें. फिर उतने ही धीरे धीरे गर्दन नीचे करते जाएँ. सांस धीरे धीरे छोड़ें और पूरी ताकत से अंदर फेफड़े की हवा बाहर फेंकें. यह व्यायाम कम से कम एक दर्जन बार, सुबह-शाम करें. इस व्यायाम से आपके गर्दन की मांसपेशियों को ताकत मिलती है तथा इसके परिणाम आपको पंद्रह दिवस के भीतर मिलने लगेंगे. नियमित व्यायाम से गर्दन दर्द से पीछा छुड़ाया जा सकता है.
होम्योपैथी चिकित्सा (Homeopathic Treatment)जहाँ बाकी चिकित्सा पद्धतियाँ विशेष कर एलोपैथी चिकित्सा पद्धति सिर्फ़ दर्दनाशक औषधियों तक ही सीमित रहती हैं, वहीं होम्योपैथी रोग के मूलकारण और उससे उत्पन्न होनी वाली समस्यायों को दूर करने मे सक्षम है। एक होम्योपैथिक चिकित्सक को सरवाईकल रोगों मे न सिर्फ़ औषधि के चयन बल्कि रोग को management करने के तरीको के बारे मे भी अच्छी तरह जानना चाहिये। आप का दृष्टिकोण समय के साथ चले , इसी मे इस पद्दति की सफ़लता निहित होगी।
सबसे पहले लेते हैं सरवाईकल रोग की थेरापियूटिक्स (therapeuctics) सेक्शन की , उसके बाद रिपरटारजेशन (repertorisation) की।

  • थेरापियूटिक्स (therapeuctics)

सरवाईकल रोगों के औषधि चयन करते समय रोग के कारणों पर अपनी नजरें जमायें रखें। विस्तार मे reference के लिये Samuel Lilientheal की
Therapeuctics को देखें।

  • Intervertebreal spaces के कम हो जाने और osteophyte के बन जाने पर –hekla lava, calc fl, phos
  • गर्दन की अकडन दर्द के सथ–actae racemosa, rhus tox, cocculus ind
  • Neurological लक्षणों के साथ, हाथ और ऊँगलियों का सुन्नपन्न–Kalmia,Parrirera brava,
  • दर्द का वेग एक या दोनो हाथों मे जाना—kalmia,nux
  • चक्कर के साथ—conium,cocculus ind
  • न सहन करने योग्य पीडा–gaultheria,stellaria media,colchichum

रिपरटारजेशन (repertorisation) यह हमेशा ध्यान रखें कि किसी रोग की थेरापियूटिक्स (therapeuctics) हमेशा चिकित्सक को सीमित दायरे मे रख देती है। अगर समय का अभाव न हो तो सरवाईकल रोगों मे भी रिपरटारजेशन का साहारा लेने मे कोताही न बरतें।
सरवाईकल रोगों मे रिपरटारजेशन (repertorisation) करने के आसान सुझाव:

  • General symptoms को सबसे पहले वरीयता क्रम मे डालें; तत्पश्चात् particular और common symptoms का नम्बर लगायें। किसी भी रोग मे rare , characteristic और striking लक्षणों को तलाशने की कोशिश करें।

मै इस बात को अच्छी तरह से समझ सकता हूँ कि विशेष कर नये होम्योपैथी चिकित्सकों को लक्षणों को लेने मे और repertorisation चाहे manual या computerised करने मे कई दुशवारियाँ आती हैं । repertorisation करने के तरीके भले ही अलग -2 हों लेकिन सार सब का एक ही है कि सही सिमिलिमम (similimum) को ढूंढना ।

  • computerised repertorisation क्यों आज की आवश्यकता है इसके लिये यहाँ देखें
  • पुराने और जटिल रोगों (chronic diseases) मे case taking लेने का आसान सा तरीका यहाँ उपलब्ध है, समय -2 पर इसको और भी आसान बनाने की कोशिश की गयी है, इसको  यहाँ देखें
  • सही तरीकों से लक्षणों को लेना क्यों होम्योपैथी मे आवशयक है , इसके लिये यह भी देखें
  • नये होम्योपैथिक चिकित्सकों को रुबरिक्स(rubrics) बनाने मे या रडार, क्लासिक 8 या मर्क्यूरिस के साफ़्ट्वेएर मे लक्षणों डालने मे समस्या हो तो आरकुट मे चल रही Revolutionized Homoeopathy से सम्पर्क करें। डा प्रवीन, डा शशिकान्त, मै और अन्य आपकी सहायता के लिये हमेशा तत्पर मिलेगें।

जनसंख्या विस्फ़ोट और धार्मिक रूढियों मे फ़ँसा इन्सान

Tuesday, 26 December 2006

ppoulation.jpg


 

बात बहुत पुरानी नहीं है मै जहाँ प्रैक्टिस करता हूँ उसके आधा कि. मी. के फ़ासले पर भारत का सबसे विख्यात इस्लामिक स्कूल “नदुआ” स्थित है। इसमे इस्लाम धर्म की शिक्षा ग्रहण करने देश-विदेश के काफ़ी मुस्लिम लडके आते हैं। करीब 20 सालों से अधिकतर लडके मेरे काफ़ी करीब रहे और लखनऊ यूनिर्वसिटी के बिल्कुल बगल मे होने के बावजूद यहां के लडकों में मैने और लडकों की अपेक्षा उच्छृन्खल प्रवृति का अभाव देखा। समस्तीपुर, बिहार का रहने वाला मो. फ़रीद नामक युवक जो यहाँ से आलमियत हाँसिल कर चुका था , घर जाने के पूर्व मुझसे मिलने आया । थोडा सकुचाते हुये बोला , “डा साहब, पिछले दिनों जब मै घर गया था तो मेरे घर वालों ने मेरा निकाह कर दिया , अब मेरी आलमियत पूरी हो चुकी है और मै अपने वतन लौट रहा हूँ, मै आप से कुछ सलाह चाहता हूं।" मैने पहले सोचा कि सेक्स से संबन्धित कुछ सलाह माँगने आया होगा। वह बोला , “ मै अभी परिवार को बढाना नहीं चाहता और आगे भी परिवार को छोटा रखना चाहता हूँ,, मुझे बच्चों पर नियन्त्रण रखने के उपाय बतायें।“ मै बहुत हैरान हुआ क्योंकि वह जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहा था , उसकी पहुँच मुस्लिम समाज मे बहुत है और वह ऐसी सोच बिल्कुल नहीं रखते। गर्भ निरोधक उपाय बताने के बाद मैने उससे कहा, “ फ़रीद , तुम अपनी इस सोच को अपने तक ही सीमित मत रखना और अगर यही सोच अपने समाज मे दे सको तब शायद अपने समाज मे एक नई पहल कर सकोगे।" मुझे नहीं मालूम कि उसने आगे अपनी इस सोच को कितना बढाया लेकिन बाद के कई सालों मे मुझे कई नये मौलाना मिले जो मुझसे अक्सर गर्भ निरोधक उपायों की जानकारी माँगने आते रहते। क्या मुस्लिम समाज में यह एक नई सोच है या समय का बदलाव, यह तो समय ही बतायेगा।

क्या परिवार नियोजन सिर्फ़ आर्थिक मामला है या धार्मिक मामला। इस लेख में कुछ ऐसे ही विचारणीय प्रश्नों को उठायेगें और उनका सही हल भी ढूँढने की कोशिश करेगें।

आज अगर आप संगरहालयों में रखे हुये कई विलुप्त जानवरों के अस्थि- पजरों को देखकर सोच रहे हों कि यह वक्त के साथ विलुप्त हो गये तो यह शायद आप की भूळ होगी। वे सामप्त हुये तो अपनी संतति के बढने के कारण्। वे इतना बढे कि उनके जीने के लिये जगह , भोजन और पानी की किल्लत हो गयी। डारविन का नियम है , "struggle for exixtence" लेकिन जीने के लिये संघर्ष भी एक दूसरे से कब तक करेगें । प्रकृति के साथ यह खेल लम्बे समय तक चल न पाया, इसलिये उनको सामूल नष्ट होना पडा।

क्या मनुष्य जाति के साथ भी ऐसी ही परिस्थिति आ सकती है? अभी तक नहीं आयी वह इसलिये कि प्रकृति ने जन्म और मृत्यु मे एक संतुलन बना रखा था। अगर पहले के दिनों को याद करे जब एक घर मे दस बच्चे होते थे , उनमे से 8 मरते थे और 2 ही बचते थे । आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। मेडिकल सांइस ने जन्म और मृत्यु के बीच का अंतर बहुत कम कर दिया है। अब 1 मरता है और 9 बचते हैं। लेकिन वक्त के साथ हमने मृत्यु के बहुत से दरवाजे तो बन्द कर दिये लेकिन जन्म के सारे दरवाजे खुले रखे। उसका परिणाम सब के सामने है, बेताहाशा बढती हुयी जनसंख्या, सारा संतुलन ही बिगड गया।

क्या इन्सानों के लिये परिवार नियोजन केवल आर्थिक मामला है, शायद नहीं। ' सम्भोग से सम्माधि की ओर' मे ओशो ने इस पक्ष की व्याख्या कुछ इस तरह की:


osho.jpg

"भोजन तो जुटाया जा सकेगा क्योंकि अभी भोजन के स्त्रोत बहुत हैं और आगे भी रहेगें लेकिन आदमी की भीड बढने के साथ क्या आदमी की आत्मा खो तो नहीं जायेगी। पहली बात ध्यान मे रखें कि जीवन एक अवकाश चाहता है। जंगल मे जानवर मुक्त है, मीलों के दायरे में घूमता है, अगर पचास बन्दरों को एक कमरे में बन्द कर दें तो उनका पागल होना शुरु हो जायेगा। प्रत्येक बन्दर को एक लिविग स्पेस चाहिये,खुली जगह चाहिये , जहां वह जी सके। .........................बढती हुई भीड एक-एक व्यक्ति पर चारों तरफ़ से अनजाना दबाब डाल रही है, भले ही हम उन दबाबों को देख न पायें। अगर यह भीड बढती चली जाती है तो मनुष्य के विक्षिप्त (neurotic) हो जाने का डर है।" ओशो


हाँ, अलबत्ता , परिवार नियोजन का मामला धार्मिक अवश्य बन गया है। किसी एक पक्ष पर दोषारोपण करने से काम नहीं चलेगा। अलग-2 पक्ष हैं और अलग-2 तर्क वितर्क हैं। एक नजरिया लेते हैं उन पक्षों का-

1-एक पक्ष कहता है कि परिवार नियोजन द्वारा अपने बच्चों की संख्या कम करना धर्म के खिलाफ़ है क्योंकि बच्चे तो ऊपर वाले की देन हैं और खिलाने वाला भी खुदा है। देने वाला वह, करने वाला वह, कराने वाला वह, फ़िर हम क्यों रोक डालें?

2-दूसरा पक्ष यह कहता है कि परिवार नियोजन जैसा अभी चल रहा है उसमें हम देखते हैं कि हिन्दू ही उसका प्रयोग कर रहे हैं, और बाकी धर्म के लोग ईसाई, मुसलिम इसका उपयोग कम कर रहे हैं। तो हो सकता है कि आने वाले कल में इनकी संख्या इतनी बढ जाये कि दूसरा पाकिस्तान मांग लें या पाकिस्तान या चीन जिनकी जनसंख्या अधिक है, वे ताकतवर हो जायें और हम पर हमला करने की चेष्टा करे।

धार्मिक पक्ष के पहले खंड को देखते हैं।

1- सब धर्मों के धर्म गुरूओ ने सब बातें ईश्वर ? पर थोप दीं कि यह सब उसकी मर्जी है और ईश्वर कभी यह जानने नहीं आता कि उसकी मर्जी क्या है। ईश्वर की इच्छा पर हम अपनी इच्छा थोपते हैं । यह तो इन्सान की बुद्दिमता पर निर्भर है कि वह सुख से रहे या दुख से रहे। जब एक बाप अपने 2-3 बच्चों के बाद भी बच्चे पैदा कर रहा है तो वह उन्हें ऐसी दुनिया मे धक्का दे रहा है जहाँ वह सिर्फ़ गरीबी ही बांट सकेगा। आज हमको यह सोचना ही होगा कि जो हम कर रहे हैं , उससे हर आदमी को जीवन की सुविधा कभी नहीं मिल सकती। हमारे धर्म गुरु समझाते हैं कि यह ईश्वर का विरोध है। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाय कि ईश्वर चाहता है कि लोग दीन और फ़टेहाल रहें। लेकिन अगर यही ईश्वर की चाह है तो ऐसे ईश्वर को भी इंकार करना पडेगा।

एक बात और अगर खुदा बच्चे पैदा कर रहा है तो बच्चों को रोकने की कल्पना कौन पैदा कर रहा है? अगर एक चिकित्सक के भीतर से ईश्वर बच्चे की जान को बचा रहा है तो चिकित्सक के भीतर से उन बच्चों को आने से रोक भी रहा है। अगर सभी कुछ उस खुदा का है तो यह परिवार नियोजन का ख्याल भी उस खुदा का ही है। परिवार नियोजन का सीधा सा अर्थ है कि पृथ्वी कितने लोगों को सुख दे सकती है। उससे ज्यादा लोगों को पृथ्वी पर खडे करना , अपने हाथो से नरक बनाना है। दूसरी बात कि ईश्वर कोई स्पाईवेएर नहीं है जो इन्सान की रतिक्रियाओं पर नजर रखे कि वह किसी साधनों का प्रयोग तो नही कर रहा ।

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जो समाज जितना समृद्द है , उसकी जनसंख्या उतनी ही कम है। अपने देश, मुस्लिम देशों और पश्चिम देशों मे यह अन्तर साफ़ दिख सकता है। बढती हुई जनसंख्या मे सबसे बुरी मार बेचारे गरीब आदमी की हुई, वह इसलिये गरीब नहीं है क्योंकि उसकी आय के साधन कम है, बलिक इसलिये कि उसकी बुद्दि को भ्रष्ट करने मे उसके तथाकथित धर्मगुरुओं का साथ मिला । एक समृद्द इनसान अपने सेक्स की उर्जा को दूसरे कामों मे लगा देता है -मसलन संगीत, साहित्य, खेल, लेखन आदि। लेकिन एक गरीब के पास सेक्स ही उसके मनोरजंन का साधन मात्र रह जाता है। भारत में अगर अधिक बच्चों का अनुपात देखें तो इस वर्ग मे अधिक मिलता है, और फ़िर वह हिन्दू हो या मुस्लिम , इससे फ़र्क नही पडता। मुस्लिमों में अधिक इसलिये भी है वह अपनी बुद्दि पर कम और अपने धर्मगुरुओं की बुद्दि पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। हिन्दू समाज मे वक्त के साथ उनके धर्मगुरुओं का प्रभाव कम होता गया जिसकी वजह से इन लोगों की पकड अब इतनी मजबूत नहीं दिखती।

2-जब हम दूसरे पक्ष के बारे मे बात करें कि क्या परिवार नियोजन को किसी की स्वेच्छा पर छोडा जाना उचित है? यह तो ऐसा ही सवाल है जैसे कि हम हत्या को या डाके को स्वेच्छा पर छोड दें कि जिसे करनी हो करे। अत: परिवार नियोजन को अनिवार्य, कम्पलसरी कर देना ही उचित है। और जब हम इस जीवंत सवाल को अनिवार्य कर देगें तो यह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई का सवाल नहीं रह जायेगा। आज के हालातों पर जरा नजर दौडायें तो इन सबके धर्मगुरु समझा रहे हैं कि तुम कम हो जाओगे या फ़लाने जयादा हो जायेगें। और हकीकत यह है कि ये सब जो सोच रहे हैं , इनके सोचने की वजह से भी अनिवार्य परिवार नियोजन का विचार समाप्त हो रहा है।.

एक और सवाल कि ऐसा हो सकता है कि अगर मुस्लिमों की आबादी इतनी बढ जाय कि वह दूसरे पाकिस्तान की माँग करने लगें। आज के वैज्ञानिक युग में जनसंख्या का कम होना, शक्ति का कम होना नहीं है। बल्कि जिन मुल्कों की जनसंख्या जितनी अधिक है वह टैकनोलोजी दृष्टिकोण से उतने ही कमजोर है। क्योंकि इतनी बडी जनसंख्या के पालन पोषण मे इनकी अतिरिक्त सम्पति बचने वाली नही है। वह जमाना गया ,जब आदमी ताकतवर था, अब युग दिमाग और मशीन का है। और मशीन उसी देश के पास हो सकेगी, जिस देश के पास संपन्नता होगी और संपन्नता उसी देश के अधिक पास होगी जिस देश के पास प्राकृतिक साधन ज्यादा और जनसंख्या कम होगी।

दूसरी बात यह बात समझने जैसी है कि संख्या कम होने से उतना बडा दुर्माग्य नहीं टूटेगा, जितना बडा दुर्भाग्य संख्या के बढ जाने से बिना किसी हमले के टूट जायेगा। आज के दौर में युद्द इतना बडा खतरा नहीं है जितना कि जनसंख्या विस्फ़ोट का है।

आज हर धर्मावलंबी को यह निर्णय लेना है कि सवाल उनकी गिनती का है या देश का। और अगर गिनती का है तो मुल्क का मर जाना निशचित है। और अगर यह साहसिक निर्णय देश का है तो किसी को तो लेना ही है। जो समाज इस निर्णय को लेगा , वह संपन्न हो जायेगा। मुसलमानों मे उनके बच्चे ज्यादा स्वस्थ ,अधिक शिक्षित होगें, ज्यादा अच्छी तरह जीवन निर्वाह करेगें। वे दूसरे समाजों और खासकर अपने ही समाज मे जिनकी संख्या कीडे-मकोडों की तरह है, उनको छोडकर आगे बढ जायेगें। और, इसका परिणाम यह भी होगा कि दूसरे समाजों और उनके ही समुदायों मे भी स्पर्धा पैदा होगी इस ख्याल से कि वे गलती कर रहे हैं।

यह सब तब ही संभव है जब हमारी सरकारें वोट-बैंक की राजनीति से परे हट कर परिवार नियोजन को स्वेच्छित नहीं , बल्कि अनिवार्य बनायेंगी ।

(इस लेख की मूल भावना ओशो रजनीश की पुस्तक " सम्भोग से सम्माधि तक " से ली गई है। विवादों मे घिरी ऐसी पुस्तक जिसको आम लोगों ने हेय दृष्टि से ही देखा, लेकिन पढकर परखा नहीं , ज़ीवन के फ़लसफ़े को एक नया आयाम देती हुई यह पुस्तक , अगर न पढी हो तो पढें अवशय ।)